Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 1 / 164 / 27

हि॒ङ्कृ॒ण्व॒ती व॑सु॒पत्नी॒ वसू॑नां व॒त्समि॒च्छन्ती॒ मन॑सा॒भ्यागा॑त्। दु॒हाम॒श्विभ्यां॒ पयो॑ अ॒घ्न्येयं सा व॑र्धतां मह॒ते सौभ॑गाय ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 164 | Mantra No : 27

In Hindi:

ऋषि : दीर्घतमा औचथ्यः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब गौ और पृथिवी के विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।

पदपाठ : हि॒ङ्ऽकृ॒ण्व॒ती। व॒सु॒ऽपत्नी॒। वसू॑नाम्। व॒त्सम्। इ॒च्छन्ती॑। मन॑सा। अ॒भि। आ। अ॒गा॒त्। दु॒हाम्। अ॒श्विऽभ्या॑म्। पयः॑। अ॒घ्न्या। इ॒यम्। सा। व॒र्ध॒ता॒म्। म॒ह॒ते। सौभ॑गाय ॥ १.१६४.२७

पदार्थ : जैसे (हिङ्कृण्वती) हिंकारती और (मनसा) मन से (वत्सम्) बछड़े को (इच्छन्ती) चाहती हुई (इयम्) यह (अघ्न्या) मारने को न योग्य गौ (अभि, आ, अगात्) सब ओर से आती वा जो (अश्विभ्याम्) सूर्य और वायु से (पयः) जल वा दूध को (दुहाम्) दुहते हुए पदार्थों में वर्त्तमान पृथिवी है (सो) वह (वसूनाम्) अग्नि आदि वसुसञ्ज्ञकों में (वसुपत्नी) वसुओं की पालनवाली (महते) अत्यन्त (सौभगाय) सुन्दर ऐश्वर्य के लिये (वर्द्धताम्) बढ़े, उन्नति को प्राप्त हो ॥ २७ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे पृथिवी महान् ऐश्वर्य को बढ़ाती है, वैसे गौएँ अत्यन्त सुख देती हैं, इससे ये गौएँ कभी किसीको मारनी न चाहियें ॥ २७ ॥