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Rigveda / 9 / 3 / 3

ए॒ष दे॒वो वि॑प॒न्युभि॒: पव॑मान ऋता॒युभि॑: । हरि॒र्वाजा॑य मृज्यते ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 3 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : शुनः शेपः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय :

पदपाठ : ए॒षः । दे॒वः । वि॒प॒न्युऽभिः॑ । पव॑मानः । ऋ॒त॒युऽभिः॑ । हरिः॑ । वाजा॑य । मृ॒ज्य॒ते॒ ॥ ९.३.३

पदार्थ : (एष देवः) यह पूर्वोक्त देव (विपन्युभिः ऋतायुभिः) सत्यवक्ता विद्वानों द्वारा (पवमानः) पवित्र वर्णन किया गया है। (हरिः) यह सब दुःखों का दूर करनेवाला परमात्मदेव (वाजाय) ज्ञानयज्ञ के लिये (मृज्यते) उपास्य रक्खा जाता है ॥३॥

भावार्थ : जिस पूर्णपुरुष को विद्वान् लोग इन्द्रियागोचर कथन करते हैं, वही पूर्ण पुरुष ज्ञानयज्ञ द्वारा ज्ञानियों के ज्ञानगम्य होकर उपास्य भाव को प्राप्त होता है ॥३॥