Rigveda / 9 / 9 / 7
अवा॒ कल्पे॑षु नः पुम॒स्तमां॑सि सोम॒ योध्या॑ । तानि॑ पुनान जङ्घनः ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 9 | Mantra No : 7
In English:
Seer : asitaH kaashyapo devalo vaa | Devta : pavamaanaH somaH | Metre : nichRRidgaayatrii | Tone : ShaDjaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : avaa kalpeShu naH pumastamaa.msi soma yodhyaa . taani punaana ja~NghanaH .
Component Words : ava . kalpeShu . naH . pumaH . tamaa.msi . soma . yodhyaa . taani . punaana . ja~NghanaH . 9.9.7
In Hindi:
ऋषि : असितः काश्यपो देवलो वा | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय :
पदपाठ : अव॑ । कल्पे॑षु । नः॒ । पुमः॑ । तमां॑सि । सो॒म॒ । योध्या॑ । तानि॑ । पु॒ना॒न॒ । ज॒ङ्घ॒नः॒ ॥ ९.९.७
पदार्थ : (सोम) हे सौम्यस्वभाव परमात्मन् ! आप (तमांसि) अज्ञानों को और जो (योध्या) युद्ध करने योग्य है (तानि) उनको (जङ्घनः) हनन करो (पुनान) हे सबको पवित्र करनेवाले परमात्मन् ! (पुमः) हे पूर्ण पुरुष ! (नः) हमारी (कल्पेषु) सब अवस्थाओं में (अव) रक्षा करें ॥७॥
भावार्थ : मनुष्य का परम शत्रु एकमात्र अज्ञान ही है, जो पुरुष अज्ञानरूपी शत्रु को नहीं जीतता, वह शूरवीर व विजयी कदापि नहीं कहला सकता, बहुत क्या, पुरुष में पुरुषत्व यही है कि वह अज्ञानरूपी शत्रु को जीतकर अभ्युदय और निःश्रेयसरूपी फलों को लाभ करे। इस अभिप्राय के लिये उक्त मन्त्र में अज्ञान के जीतने की परमात्मा से प्रार्थना की गई है और अज्ञानरूपी शत्रु की शत्रुता का वर्णन “पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम्।” गीता के इस श्लोक में सुप्रसिद्ध है कि हे जीव तू ज्ञान और विज्ञान के नाश करनेवाले परम शत्रु अज्ञान का सबसे पहले नाश कर ॥७॥
In Sanskrit:
ऋषि : असितः काश्यपो देवलो वा | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः
पदपाठ : अव॑ । कल्पे॑षु । नः॒ । पुमः॑ । तमां॑सि । सो॒म॒ । योध्या॑ । तानि॑ । पु॒ना॒न॒ । ज॒ङ्घ॒नः॒ ॥ ९.९.७
भावार्थ :