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Rigveda / 1 / 164 / 49

यस्ते॒ स्तन॑: शश॒यो यो म॑यो॒भूर्येन॒ विश्वा॒ पुष्य॑सि॒ वार्या॑णि। यो र॑त्न॒धा व॑सु॒विद्यः सु॒दत्र॒: सर॑स्वति॒ तमि॒ह धात॑वे कः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 164 | Mantra No : 49

In Hindi:

ऋषि : दीर्घतमा औचथ्यः | देवता : सरस्वती | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर यहाँ विदुषी स्त्री के विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : यः। ते॒। स्तनः॑। श॒श॒यः। यः। म॒यः॒ऽभूः। येन॑। विश्वा॑। पुष्य॑सि। वार्या॑णि। यः। र॒त्न॒ऽधाः। व॒सु॒ऽवित्। यः। सु॒ऽदत्रः॑। सर॑स्वति। तम्। इ॒ह। धात॑वे। क॒रिति॑ कः ॥ १.१६४.४९

पदार्थ : हे (सरस्वति) विदुषी स्त्री ! (ते) तेरा (यः) जो (शशयः) सोतासा शान्त और (यः) जो (मयोभूः) सुख की भावना करनेहारा (स्तनः) स्तन के समान वर्त्तमान शुद्ध व्यवहार (येन) जिससे तू (विश्वा) समस्त (वार्याणि) स्वीकार करने योग्य विद्या आदि वा धनों को (पुष्यसि) पुष्ट करती है (यः) जो (रत्नधाः) रमणीय वस्तुओं को धारण करने और (वसुवित्) धनों को प्राप्त होनेवाला और (यः) जो (सुदत्रः) सुदत्र अर्थात् जिससे अच्छे-अच्छे देने हों (तम्) उस अपने स्तन को (इह) यहाँ गृहाश्रम में (धातवे) सन्तानों के पीने को (कः) कर ॥ ४९ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे माता अपने स्तन के दूध से सन्तान की रक्षा करती है, वैसे विदुषी स्त्री सब कुटुम्ब की रक्षा करती है, जैसे सुन्दर घृतान्न पदार्थों के भोजन करने से शरीर बलवान् होता है, वैसे माता की सुशिक्षा को पाकर आत्मा पुष्ट होता है ॥ ४९ ॥