Rigveda / 9 / 18 / 3
तव॒ विश्वे॑ स॒जोष॑सो दे॒वास॑: पी॒तिमा॑शत । मदे॑षु सर्व॒धा अ॑सि ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 18 | Mantra No : 3
In English:
Seer : asitaH kaashyapo devalo vaa | Devta : pavamaanaH somaH | Metre : gaayatrii | Tone : ShaDjaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : tava vishve sajoShaso devaasaH piitimaashata . madeShu sarvadhaa asi .
Component Words : tava . vishve . sa.ajoShasaH . devaasaH . piitim . aashata . madeShu . sarva.adhaaH . asi . 9.18.3
In Hindi:
ऋषि : असितः काश्यपो देवलो वा | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय :
पदपाठ : तव॑ । विश्वे॑ । स॒ऽजोष॑सः । दे॒वासः॑ । पी॒तिम् । आ॒श॒त॒ । मदे॑षु । स॒र्व॒ऽधाः । अ॒सि॒ ॥ ९.१८.३
पदार्थ : हे परमात्मन् ! (तव पीतिम्) आपकी तृप्ति को (सजोषसः) परस्पर प्रेम करनेवाले (विश्वे देवासः) सब विज्ञानी लोग (आशत) पाते हैं (मदेषु) हर्षयुक्त वस्तुओं में (सर्वधाः) सब प्रकार की शोभा के धारण करानेवाले (असि) आप हैं ॥३॥
भावार्थ : परमात्मा के आनन्द को विज्ञानी लोग ही वस्तुतः पा सकते हैं, अन्य नहीं। कारण यह कि विविध प्रकार के ज्ञान के विना उसका आनन्द मिलना अति कठिन है ॥३॥
In Sanskrit:
ऋषि : असितः काश्यपो देवलो वा | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः
पदपाठ : तव॑ । विश्वे॑ । स॒ऽजोष॑सः । दे॒वासः॑ । पी॒तिम् । आ॒श॒त॒ । मदे॑षु । स॒र्व॒ऽधाः । अ॒सि॒ ॥ ९.१८.३
भावार्थ :