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Rigveda / 9 / 25 / 4

विश्वा॑ रू॒पाण्या॑वि॒शन्पु॑ना॒नो या॑ति हर्य॒तः । यत्रा॒मृता॑स॒ आस॑ते ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 25 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : दृळहच्युतः आगस्त्यः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अब इस बात का कथन करते हैं कि मुक्त पुरुष ब्रह्म के स्वरूप में निवास करते हैं।

पदपाठ : विश्वा॑ । रू॒पाणि॑ । आ॒ऽवि॒शन् । पु॒ना॒नः । या॒ति॒ । ह॒र्य॒तः । यत्र॑ । अ॒मृता॑सः । आस॑ते ॥ ९.२५.४

पदार्थ : (पुनानः) सबको पवित्र करता हुआ (विश्वा रूपाणि) सब रूपों में (आविशन्) प्रवेश करता हुआ (हर्यतः) अपनी कमनीयता से (याति) सर्वत्र प्राप्त है (यत्र) जिस ब्रह्मरूप में (अमृतासः) मुक्ति पद को भोगते हुए (आसते) मुक्त पुरुष निवास करते हैं, वह ब्रह्म सबको पवित्र करनेवाला है ॥४॥

भावार्थ : परमात्मा प्रत्येक वस्तु के भीतर व्यापक है अर्थात् वह प्रत्येक रूप में प्रविष्ट है। इसी तात्पर्य से उपनिषद् में कथन किया है “रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव” प्रत्येक रूप में परमात्मा तद्रूप हो रहा है अर्थात् उसी की सत्ता से उस रूप की मनोहरता है। इस प्रकार का जो सर्वाधिकरण परमात्मा है, उसी में मुक्त पुरुष जाकर निवास करते हैं ॥४॥