Rigveda / 1 / 165 / 6
क्व१॒॑ स्या वो॑ मरुतः स्व॒धासी॒द्यन्मामेकं॑ स॒मध॑त्ताहि॒हत्ये॑। अ॒हं ह्यु१॒॑ग्रस्त॑वि॒षस्तुवि॑ष्मा॒न्विश्व॑स्य॒ शत्रो॒रन॑मं वध॒स्नैः ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 165 | Mantra No : 6
In English:
Seer : agastyaH | Devta : indra: | Metre : bhurikpa~Nkti | Tone : pa~nchamaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : kva1 syaa vo marutaH svadhaasiidyanmaameka.m samadhattaahihatye. aha.m hyu1grastaviShastuviShmaanvishvasya shatroranama.m vadhasnaiH .
Component Words : kva. syaa. vaH. marutaH. svadhaa. aasiit. yat. maam. ekam. sam.aadhatta. ahi.ahatye. aham. hi. ugraH. taviShaH. tuviShmaan. vishvasya. shatroH. anamam. vadha.asnaiH . 1.165.6
In Hindi:
ऋषि : अगस्त्यः | देवता : इन्द्र: | छन्द : भुरिक्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः
विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।
पदपाठ : क्व॑। स्या। वः॒। म॒रु॒तः॒। स्व॒धा। आ॒सी॒त्। यत्। माम्। एक॑म्। स॒म्ऽअध॑त्त। अ॒हि॒ऽहत्ये॑। अ॒हम्। हि। उ॒ग्रः। त॒वि॒षः। तुवि॑ष्मान्। विश्व॑स्य। शत्रोः॑। अन॑मम्। व॒ध॒ऽस्नैः ॥ १.१६५.६
पदार्थ : हे (मरुतः) प्राण के समान वर्त्तमान विद्वानो ! (यत्) जिससे (माम्) मुझ (एकम्) एक को (अहिहत्ये) मेघ के वर्षण होने में (समधत्त) अच्छे प्रकार धारण करो (स्या) वह (वः) आपका (स्वधा) अन्न और जल (क्व) कहाँ (आसीत्) है वैसे (तुविष्मान्) बलवान् (उग्रः) तीव्र स्वभाववाला (अहम्) मैं जो (तविषः) बलवान् (विश्वस्य) समग्र (शत्रोः) शत्रु के (वधस्नैः) वध से नहानेवाले शस्त्र उनसे साथ (अनमम्) नमता हूँ (हि) उसी मुझको तुम सुख में धारण करो ॥ ६ ॥
भावार्थ : जो मनुष्य विद्याओं को धारण कर सूर्य जैसे मेघ को वैसे शत्रु बल को निवृत्त करें, वे सब विद्वान् के प्रति पूछें कि जो सबको धारण करनेवाली शक्ति है, वह कहाँ है ? सर्वत्र स्थित है, यह उत्तर है ॥ ६ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : अगस्त्यः | देवता : इन्द्र: | छन्द : भुरिक्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः
विषय : पुनस्तमेव विषयमाह ।
पदपाठ : क्व॑। स्या। वः॒। म॒रु॒तः॒। स्व॒धा। आ॒सी॒त्। यत्। माम्। एक॑म्। स॒म्ऽअध॑त्त। अ॒हि॒ऽहत्ये॑। अ॒हम्। हि। उ॒ग्रः। त॒वि॒षः। तुवि॑ष्मान्। विश्व॑स्य। शत्रोः॑। अन॑मम्। व॒ध॒ऽस्नैः ॥ १.१६५.६
पदार्थ : (क्व) कुत्र (स्या) असौ (वः) युष्माकम् (मरुतः) प्राणा इव वर्त्तमानाः (स्वधा) अन्नमुदकं वा (आसीत्) अस्ति (यत्) (माम्) (एकम्) (समधत्त) सम्यग् धरतः (अहिहत्ये) मेघहनने (अहम्) (हि) खलु (उग्रः) तीव्रस्वभावः (तविषः) बलवतः (तुविष्मान्) बलवान्। तुविरिति बलना०। निघं० ३। १। (विश्वस्य) समग्रस्य (शत्रोः) (अनमम्) नमामि (वधस्नैः) यानि वधेन स्नापयन्ति शस्त्राणि तैः ॥ ६ ॥
अन्वय : हे मरुतो यद्यतो मामेकमहिहत्ये समधत्त स्या वः स्वधा क्वाऽऽसीत्। यथा तुविष्मानुग्रोऽहं तविषो विश्वस्य शत्रोर्वधस्नैरनमँस्तं हि मां यूयं सुखे धरत ॥ ६ ॥
भावार्थ : ये मनुष्या विद्या धृत्वा सूर्यो मेघमिव शत्रुबलं निवारयेयुस्ते सर्वे विद्वांसं प्रति पृच्छेयुर्या सर्वधारिका शक्तिर्वर्त्तते सा क्वाऽस्तीति सर्वत्र स्थितेत्युत्तरम् ॥ ६ ॥