Rigveda / 9 / 26 / 4
तम॑ह्यन्भु॒रिजो॑र्धि॒या सं॒वसा॑नं वि॒वस्व॑तः । पतिं॑ वा॒चो अदा॑भ्यम् ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 26 | Mantra No : 4
In English:
Seer : idhmavaaho daaLarhachyutaH | Devta : pavamaanaH somaH | Metre : nichRRidgaayatrii | Tone : ShaDjaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : tamahyanbhurijordhiyaa sa.mvasaana.m vivasvataH . pati.m vaacho adaabhyam .
Component Words : tam . ahyan . bhurijoH . dhiyaa . sam.avasaanam . vivasvataH . patim . vaachaH . adaabhyam . 9.26.4
In Hindi:
ऋषि : इध्मवाहो दाळर्हच्युतः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय :
पदपाठ : तम् । अ॒ह्य॒न् । भु॒रिजोः॑ । धि॒या । स॒म्ऽवसा॑नम् । वि॒वस्व॑तः । पति॑म् । वा॒चः । अदा॑भ्यम् ॥ ९.२६.४
पदार्थ : (वाचः पतिम्) जो ऋग्वेदादि वाणियों का पति परमात्मा है और (अदाभ्यम्) जो निष्कपट सेवन करने योग्य है (संवसानम्) सम्पूर्ण ब्रह्माण्डों में व्यापक है, (तम्) उस परमात्मा को तथा (विवस्वतः) उस प्रकाशस्वरूप की (भुरिजोः) शक्तियों को विद्वान् लोग (धिया) अपनी बुद्धि से (अह्यन्) साक्षात्कार करते हैं ॥४॥
भावार्थ : जिस प्रकाशस्वरूप परमात्मा से ऋगादि चारों वेद उत्पन्न होते हैं अर्थात् ऋगादि वेद जिसकी वाणीरूप हैं, वह परमात्मा योगीजनों के ध्यानगोचर होकर उनको आनन्द का प्रदान करता है ॥४॥
In Sanskrit:
ऋषि : इध्मवाहो दाळर्हच्युतः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः
पदपाठ : तम् । अ॒ह्य॒न् । भु॒रिजोः॑ । धि॒या । स॒म्ऽवसा॑नम् । वि॒वस्व॑तः । पति॑म् । वा॒चः । अदा॑भ्यम् ॥ ९.२६.४
भावार्थ :