Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 9 / 30 / 5

अ॒प्सु त्वा॒ मधु॑मत्तमं॒ हरिं॑ हिन्व॒न्त्यद्रि॑भिः । इन्द॒विन्द्रा॑य पी॒तये॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 30 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : बिन्दुः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय :

पदपाठ : अ॒प्ऽसु । त्वा॒ । मधु॑मत्ऽतम॑म् । हरि॑म् । हि॒न्व॒न्ति॒ । अद्रि॑ऽभिः । इन्दो॒ इति॑ । इन्द्रा॑य । पी॒तये॑ ॥ ९.३०.५

पदार्थ : (इन्दो) हे एश्वर्याभिलाषी जीव ! (अप्सु) सव रसों में (मधुमत्तमम्) मीठा जो एक प्रकार का रस है, ऐसे (त्वा) तुमको (हरिम्) जो तुम अज्ञान के हरनेवाले हो (अद्रिभिः) वाणीरूप व्रज से हिन्वन्ति वेदवेत्ता पुरुष तुम्हें प्रेरित करते हैं, ताकि तुम (इन्द्राय) कर्मयोगी को (पीतये) ऐश्वर्यप्रदान करने के लिये समर्थ बनो ॥५॥

भावार्थ : जो पुरुष धार्मिक बन के सदुपदेश करते हैं, वे मानो सब रसों में से अपने आपको माधुर्य्यसम्पन्न सिद्ध करते हैं और वे ही लोग उपदेष्टा बनकर संसार में लोगों को कर्मयोग का उपदेश करते हैं ॥५॥