Rigveda / 9 / 35 / 5
तं गी॒र्भिर्वा॑चमीङ्ख॒यं पु॑ना॒नं वा॑सयामसि । सोम॒ जन॑स्य॒ गोप॑तिम् ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 35 | Mantra No : 5
In English:
Seer : prabhuvasuH | Devta : pavamaanaH somaH | Metre : gaayatrii | Tone : ShaDjaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : ta.m giirbhirvaachamii~Nkhaya.m punaana.m vaasayaamasi . soma janasya gopatim .
Component Words : tam . giiH.abhiH . vaacham.aii~Nkhayam . punaanam . vaasayaamasi . somam . janasya . go.apatim . 9.35.5
In Hindi:
ऋषि : प्रभुवसुः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय :
पदपाठ : तम् । गीः॒ऽभिः । वा॒च॒म्ऽई॒ङ्ख॒यम् । पु॒ना॒नम् । वा॒स॒या॒म॒सि॒ । सोम॑म् । जन॑स्य । गोऽप॑तिम् ॥ ९.३५.५
पदार्थ : (वाचमीङ्खयम्) वेदवाणियों में निवास करनेवाले (पुनानम्) सबको पवित्र करनेवाले (जनस्य गोपतिम्) मनुष्यों की इन्द्रियवृत्तियों को प्रेरणा करनेवाले (तम् सोमम्) उस परमात्मा को (गीर्भिः) स्तुतियों द्वारा (वासयामसि) अपने अन्तःकरण में बसाते हैं ॥५॥
भावार्थ : परमात्मा के स्व अन्तःकरण में धारण करने का उपाय यह है कि पुरुष उसके सद्गुणों का चिन्तन करके उसके स्वरूप में मग्न हो जाय, इसी का नाम परमात्मप्राप्ति वा परमात्मयोग है ॥५॥
In Sanskrit:
ऋषि : प्रभुवसुः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः
पदपाठ : तम् । गीः॒ऽभिः । वा॒च॒म्ऽई॒ङ्ख॒यम् । पु॒ना॒नम् । वा॒स॒या॒म॒सि॒ । सोम॑म् । जन॑स्य । गोऽप॑तिम् ॥ ९.३५.५
भावार्थ :