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Rigveda / 1 / 165 / 12

ए॒वेदे॒ते प्रति॑ मा॒ रोच॑माना॒ अने॑द्य॒: श्रव॒ एषो॒ दधा॑नाः। सं॒चक्ष्या॑ मरुतश्च॒न्द्रव॑र्णा॒ अच्छा॑न्त मे छ॒दया॑था च नू॒नम् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 165 | Mantra No : 12

In Hindi:

ऋषि : अगस्त्यः | देवता : इन्द्र: | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : ए॒व। इत्। ए॒ते। प्रति॑। मा॒। रोच॑मानाः। अने॑द्यः। श्रवः॑। आ। इषः॑। दधा॑नाः। स॒म्ऽचक्ष्य॑। म॒रु॒तः॒। च॒न्द्रऽव॑र्णाः। अच्छा॑न्त। मे॒। छ॒दया॑थ। च॒। नू॒नम् ॥ १.१६५.१२

पदार्थ : हे (मरुतः) प्राणों के समान प्रिय विद्वान् जनो ! जैसे (इषः) इच्छाओं को (आ, दधानाः) अच्छे प्रकार धारण किये हुए (मा, इत्) मेरे ही (प्रति, रोचमानाः) प्रति प्रकाशमान होते हुए (एते) ये तुम (अनेद्यः) प्रशंसनीय (श्रवः) सुनने के साधन शास्त्र को (संचक्ष्य) पढ़ा वा उसका उपदेशमात्र कर (चन्द्रवर्णाः) चन्द्रमा के समान उज्ज्वल कान्तिवाले हुए मुझे (अच्छान्त) विद्या से ढाँपते हुए वैसे (एव) ही अब (च) भी (नूनम्) निश्चय से (मे, छदयाथ) विद्याओं से आच्छादित करो, मेरी अविद्या को दूर करो और विद्या देओ ॥ १२ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो स्त्री-पुरुषों को विद्याओं में प्रकाशित और उन्हें प्रशंसित गुण, कर्म, स्वभाववाले कर धर्मयुक्त व्यवहारों में लगाते हैं, वे सबके सुभूषित करनेवाले हों ॥ १२ ॥