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Rigveda / 9 / 39 / 6

स॒मी॒ची॒ना अ॑नूषत॒ हरिं॑ हिन्व॒न्त्यद्रि॑भिः । योना॑वृ॒तस्य॑ सीदत ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 39 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : बृहन्मतिः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय :

पदपाठ : स॒मी॒ची॒नाः । अ॒नू॒ष॒त॒ । हरि॑म् । हि॒न्व॒न्ति॒ । अद्रि॑ऽभिः । योनौ॑ । ऋ॒तस्य॑ । सी॒द॒त्च ॥ ९.३९.६

पदार्थ : हे परमात्मन् ! (हरिम्) पापों को नाश करनेवाले आपकी (समीचीनाः) सत्कर्मी ऋत्विगादि लोग (अनूषत) स्तुति करते हैं। तथा (अद्रिभिः हिन्वन्ति) इन्द्रियवृत्तियों द्वारा ज्ञान का विषय बनाते हैं (ऋतस्य योनौ सीदत) हे परमात्मन् ! आप सत्य की योनि यज्ञ में स्थित होवें ॥६॥

भावार्थ : याज्ञिक पुरुष अपने अन्तःकरण को यज्ञवेदिस्थानी बनाकर परमात्मज्ञान को हवनीय बनाकर इस ज्ञानमय यज्ञ से प्रजा को सुगन्धित करते हैं। तात्पर्य यह है कि अध्यात्मयज्ञ ही एकमात्र परमात्मप्राप्ति का मुख्य साधन है, अन्य जलस्थलादि कोई वस्तु भी परमात्मप्राप्ति का मुख्य साधन नहीं ॥६॥ यह ३९ वाँ सूक्त और २९ वाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥