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Rigveda / 9 / 44 / 3

अ॒यं दे॒वेषु॒ जागृ॑विः सु॒त ए॑ति प॒वित्र॒ आ । सोमो॑ याति॒ विच॑र्षणिः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 44 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : अयास्यः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय :

पदपाठ : अ॒यम् । दे॒वेषु॑ । जागृ॑विः । सु॒तः । ए॒ति॒ । प॒वित्रे॑ । आ । सोमः॑ । या॒ति॒ । विच॑र्षणिः ॥ ९.४४.३

पदार्थ : (जागृविः सुतः अयम् सोमः) स्वयंसिद्ध जागरूक यह परमात्मा (विचर्षणिः) सबको देखता हुआ (आ याति) सर्वत्र व्याप्त है और (देवेषु) विद्वानों के (पवित्रे) हृदय में (एति) आर्विभूत होता है ॥३॥

भावार्थ : अन्य लोगों की जागृति नैमित्तिकी होती है अर्थात् स्वतःसिद्ध नहीं होती। एकमात्र परमात्मा की जागृति ही स्वतःसिद्ध है अर्थात् परमात्मा ही ज्ञानस्वरूप है, अन्य सब जीव पराधीन ज्ञानवाले हैं ॥३॥