Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 9 / 46 / 6

ए॒तं मृ॑जन्ति॒ मर्ज्यं॒ पव॑मानं॒ दश॒ क्षिप॑: । इन्द्रा॑य मत्स॒रं मद॑म् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 46 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : अयास्यः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय :

पदपाठ : ए॒तम् । मृ॒ज॒न्ति॒ । मर्ज्य॑म् । पव॑मानम् । दश॑ । क्षिपः॑ । इन्द्रा॑य । म॒त्स॒रम् । मद॑म् ॥ ९.४६.६

पदार्थ : (पवमानम्) सबको पवित्र करनेवाले (मर्ज्यम् एतम्) संभजनीय उस परमात्मा को (दश क्षिपः मृजन्ति) दश इन्द्रियें ज्ञानगोचर करती हैं। जो परमात्मा (इन्द्राय मत्सरम्) जीवात्मा के लिये आह्लादकारक मद है ॥६॥

भावार्थ : परमात्मा ही जीवात्मा के लिये एकमात्र आनन्द का स्त्रोत है। उसी के आनन्द का लाभ करके जीव आनन्दित होता है ॥६॥३॥ यह ४६ वाँ सूक्त और तीसरा वर्ग समाप्त हुआ ॥