Rigveda / 9 / 47 / 2
कृ॒तानीद॑स्य॒ कर्त्वा॒ चेत॑न्ते दस्यु॒तर्ह॑णा । ऋ॒णा च॑ धृ॒ष्णुश्च॑यते ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 47 | Mantra No : 2
In English:
Seer : kavibhaargavaH | Devta : pavamaanaH somaH | Metre : nichRRidgaayatrii | Tone : ShaDjaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : kRRitaaniidasya kartvaa chetante dasyutarhaNaa . RRINaa cha dhRRiShNushchayate .
Component Words : kRRitaani . it . asya . kartvaa . chetante . dasyu.atarhaNaa . RRINaa . cha . dhRRiShNuH . chayate . 9.47.2
In Hindi:
ऋषि : कविभार्गवः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय :
पदपाठ : कृ॒तानि॑ । इत् । अ॒स्य॒ । कर्त्वा॑ । चेत॑न्ते । द॒स्यु॒ऽतर्ह॑णा । ऋ॒णा । च॒ । धृ॒ष्णुः । च॒य॒ते॒ ॥ ९.४७.२
पदार्थ : विद्वान् लोग (अस्य इत्) इस परमात्मा के (दस्युतर्हणा कृतानि कर्त्वा) दुष्टनाशनरूप किये हुये कर्म्मों का (चेतन्ते) स्मरण करते हैं (धृष्णुः) और स्वयंशासक वह परमात्मा (ऋणा च चयते) देवऋणादि तीनों ऋणों के उद्धार का उपदेश करता है ॥२॥
भावार्थ : देवऋण, पितृऋण, ऋषिऋण इन तीन ऋणों को उतारने योग्य वही पुरुष हो सकता है, जो परमात्माज्ञापालन करता हुआ उद्योगी बनता है ॥२॥
In Sanskrit:
ऋषि : कविभार्गवः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः
पदपाठ : कृ॒तानि॑ । इत् । अ॒स्य॒ । कर्त्वा॑ । चेत॑न्ते । द॒स्यु॒ऽतर्ह॑णा । ऋ॒णा । च॒ । धृ॒ष्णुः । च॒य॒ते॒ ॥ ९.४७.२
भावार्थ :