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Rigveda / 9 / 64 / 11

ऊ॒र्मिर्यस्ते॑ प॒वित्र॒ आ दे॑वा॒वीः प॒र्यक्ष॑रत् । सीद॑न्नृ॒तस्य॒ योनि॒मा ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 64 | Mantra No : 11

In Hindi:

ऋषि : कश्यपः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय :

पदपाठ : ऊ॒र्मिः । यः । ते॒ । प॒वित्रे॑ । आ । द॒व॒ऽअ॒वीः । प॒रि॒ऽअक्ष॑रत् । सीद॑न् । ऋ॒तस्य॑ । योनि॑म् । आ ॥ ९.६४.११

पदार्थ : हे दिव्यस्वरूप परमात्मन् ! (ते) तुम्हारे आनन्द की (ऊर्मिः) लहरें (यः) जो (देवावीः) दिव्य हैं, वे (पवित्रे) पवित्र अन्तःकरणों में (पर्यरक्षत्) सब ओर से बहती हैं। आप (ऋतस्य) सचाई के (योनिमासीदन्) धाम में निवास करते हैं ॥११॥

भावार्थ : परमात्मा शुद्ध अन्तःकरणवाले पुरुषों के हृदयों को अपनी सुधामयी वृष्टि से सिञ्चित कर देता है ॥११॥