Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 9 / 64 / 17

म॒र्मृ॒जा॒नास॑ आ॒यवो॒ वृथा॑ समु॒द्रमिन्द॑वः । अग्म॑न्नृ॒तस्य॒ योनि॒मा ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 64 | Mantra No : 17

In Hindi:

ऋषि : कश्यपः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय :

पदपाठ : म॒र्मृ॒जा॒नासः॑ । आ॒यवः॑ । वृथा॑ । स॒मु॒द्रम् । इन्द॑वः । अग्म॑न् । ऋ॒तस्य॑ । योनि॑म् । आ ॥ ९.६४.१७

पदार्थ : उक्त परमात्मा (ऋतस्य योनिं) सत्यता के स्थान को (आ) भली-भाँति (अग्मन्) प्राप्त होता है। वह परमात्मा (मर्मृजानासः) सबको पवित्र करनेवाला है (आयवः) गतिशील है (इन्दवः) प्रकाशस्वरूप है तथा (वृथा समुद्रम्) अन्तरिक्ष में भी अनायास गमन करनेवाला है ॥१७॥

भावार्थ : उक्त सर्वशक्तिसम्पन्न परमात्मा विना परिश्रम के ही अन्तरिक्षादि लोकों में गमन कर सकता है, अन्य नहीं ॥१७॥