Rigveda / 9 / 65 / 9
तस्य॑ ते वा॒जिनो॑ व॒यं विश्वा॒ धना॑नि जि॒ग्युष॑: । स॒खि॒त्वमा वृ॑णीमहे ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 65 | Mantra No : 9
In English:
Seer : bhRRigurvaaruNirjamadagnirvaa | Devta : pavamaanaH somaH | Metre : gaayatrii | Tone : ShaDjaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : tasya te vaajino vaya.m vishvaa dhanaani jigyuShaH . sakhitvamaa vRRiNiimahe .
Component Words : tasya . te . vaajinaH . vayam . vishvaa . dhanaani . jigyuShaH . sakhi.atvam . aa . vRRiNiimahe . 9.65.9
In Hindi:
ऋषि : भृगुर्वारुणिर्जमदग्निर्वा | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय :
पदपाठ : तस्य॑ । ते॒ । वा॒जिनः॑ । व॒यम् । विश्वा॑ । धना॑नि । जि॒ग्युषः॑ । स॒खि॒ऽत्वम् । आ । वृ॒णी॒म॒हे॒ ॥ ९.६५.९
पदार्थ : हे परमात्मन् ! जो आप (विश्वा) सम्पूर्ण (धनानि) धन (जिग्युषः) स्वाधीन करनेवाले हैं, (तस्य ते) उस आपके (सखित्वम्) मैत्रीभाव को (वाजिनः) हम उपासक लोग (आ वृणीमहे) सब प्रकार से वरण करते हैं ॥९॥
भावार्थ : इस मन्त्र में परमात्मा के साथ मैत्रीभाव का उपदेश है। तात्पर्य यह है कि जो सर्वशक्तिसम्पन्न परमात्मा से मित्रता का भाव रखते हैं, वे लोग परमात्मा के प्रिय गुणों को अपने में अवश्यमेव धारण करते हैं ॥९॥
In Sanskrit:
ऋषि : भृगुर्वारुणिर्जमदग्निर्वा | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः
पदपाठ : तस्य॑ । ते॒ । वा॒जिनः॑ । व॒यम् । विश्वा॑ । धना॑नि । जि॒ग्युषः॑ । स॒खि॒ऽत्वम् । आ । वृ॒णी॒म॒हे॒ ॥ ९.६५.९
भावार्थ :