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Rigveda / 9 / 65 / 28

आ ते॒ दक्षं॑ मयो॒भुवं॒ वह्नि॑म॒द्या वृ॑णीमहे । पान्त॒मा पु॑रु॒स्पृह॑म् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 65 | Mantra No : 28

In Hindi:

ऋषि : भृगुर्वारुणिर्जमदग्निर्वा | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय :

पदपाठ : आ । ते॒ । दक्ष॑म् । म॒यः॒ऽभुव॑म् । वह्नि॑म् । अ॒द्य । वृ॒णी॒म॒हे॒ । पान्त॑म् । आ । पु॒रु॒ऽस्पृह॑म् ॥ ९.६५.२८

पदार्थ : (मयोभुवम्) जो सब सुखों के देनेवाले आप हैं, (पुरुस्पृहं) जो सब पुरुषों से भजनीय हैं, (पान्तं) सर्वरक्षक हैं, (दक्षं) सर्वज्ञ हैं, (वह्निम्) प्रकाशस्वरूप हैं, उक्तगुणसम्पन्न (ते) आपको (अद्य) आज (आ वृणीमहे) हम सब प्रकार स्वीकार करते हैं ॥२८॥

भावार्थ : जो उपासक उक्तगुणसम्पन्न परमात्मा की उपासना करते हैं, वे सब प्रकार से शुद्ध होकर परमात्मभाव को प्राप्त होते हैं ॥२८॥