Rigveda / 9 / 66 / 9
मृ॒जन्ति॑ त्वा॒ सम॒ग्रुवोऽव्ये॑ जी॒रावधि॒ ष्वणि॑ । रे॒भो यद॒ज्यसे॒ वने॑ ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 66 | Mantra No : 9
In English:
Seer : shata.m vaikhaanasaaH | Devta : pavamaanaH somaH | Metre : nichRRidgaayatrii | Tone : ShaDjaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : mRRijanti tvaa samagruvo.avye jiiraavadhi ShvaNi . rebho yadajyase vane .
Component Words : mRRijanti . tvaa . sam . agruvaH . avye . jiirau . adhi . svani . rebhaH . yat . ajyase . vane . 9.66.9
In Hindi:
ऋषि : शतं वैखानसाः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय :
पदपाठ : मृ॒जन्ति॑ । त्वा॒ । सम् । अ॒ग्रुवः॑ । अव्ये॑ । जी॒रौ । अधि॑ । स्वनि॑ । रे॒भः । यत् । अ॒ज्यसे॑ । वने॑ ॥ ९.६६.९
पदार्थ : हे जगदीश ! (रेभः) शब्दगम्य (अव्ये) पालक (अधिष्वणि) शब्दगम्य (जीरौ) शत्रुनाशक (वने) भजनीय (त्वा) आपको (अग्रुवः) कर्मयोगी जन (यत्) जब (सम्मृजन्ति) ध्यानविषय करते हैं, तब आप (अज्यसे) उनके साक्षात्कार के विषय होते हैं ॥९॥
भावार्थ : इस मन्त्र में सर्वरक्षक परमात्मा के साक्षात्कार का वर्णन किया गया है कि कर्मयोगी लोग अपने कर्मण्यतायोग से परमात्मपरायण होकर परमात्मा का साक्षात्कार करते हैं ॥९॥
In Sanskrit:
ऋषि : शतं वैखानसाः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः
पदपाठ : मृ॒जन्ति॑ । त्वा॒ । सम् । अ॒ग्रुवः॑ । अव्ये॑ । जी॒रौ । अधि॑ । स्वनि॑ । रे॒भः । यत् । अ॒ज्यसे॑ । वने॑ ॥ ९.६६.९
भावार्थ :