Rigveda / 9 / 66 / 22
पव॑मानो॒ अति॒ स्रिधो॒ऽभ्य॑र्षति सुष्टु॒तिम् । सूरो॒ न वि॒श्वद॑र्शतः ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 66 | Mantra No : 22
In English:
Seer : shata.m vaikhaanasaaH | Devta : pavamaanaH somaH | Metre : viraaDgaayatrii | Tone : ShaDjaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : pavamaano ati sridho.abhyarShati suShTutim . suuro na vishvadarshataH .
Component Words : pavamaanaH . ati . sridhaH . abhi . arShati . su.astutim . suuraH . na . vishva.adarshataH . 9.66.22
In Hindi:
ऋषि : शतं वैखानसाः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : विराड्गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय :
पदपाठ : पव॑मानः । अति॑ । स्रिधः॑ । अ॒भि । अ॒र्ष॒ति॒ । सु॒ऽस्तु॒तिम् । सूरः॑ । न । वि॒श्वऽद॑र्शतः ॥ ९.६६.२२
पदार्थ : (पवमानः) पवित्र करनेवाला परमात्मा (स्रिधः अति) दुष्टों को अतिक्रमण करता है और (सुष्टुतिम्) सद्गुणसंपन्न पुरुषों को (अभ्यर्षति) प्राप्त होता है, वह परमात्मा (सूरो न) सूर्य की तरह (विश्वदर्शतः) स्वतःप्रकाश है ॥२२॥
भावार्थ : जो पुरुष संयमी बनकर ईश्वरपरायण होते हैं, परमात्मा उन पर अवश्यमेव कृपा करता है ॥२२॥
In Sanskrit:
ऋषि : शतं वैखानसाः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : विराड्गायत्री | स्वर : षड्जः
पदपाठ : पव॑मानः । अति॑ । स्रिधः॑ । अ॒भि । अ॒र्ष॒ति॒ । सु॒ऽस्तु॒तिम् । सूरः॑ । न । वि॒श्वऽद॑र्शतः ॥ ९.६६.२२
भावार्थ :