Rigveda / 9 / 68 / 6
म॒न्द्रस्य॑ रू॒पं वि॑विदुर्मनी॒षिण॑: श्ये॒नो यदन्धो॒ अभ॑रत्परा॒वत॑: । तं म॑र्जयन्त सु॒वृधं॑ न॒दीष्वाँ उ॒शन्त॑मं॒शुं प॑रि॒यन्त॑मृ॒ग्मिय॑म् ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 68 | Mantra No : 6
In English:
Seer : vatsaprirbhaalandanaH | Devta : pavamaanaH somaH | Metre : nichRRijjagatii | Tone : niShaadaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : mandrasya ruupa.m vividurmaniiShiNaH shyeno yadandho abharatparaavataH . ta.m marjayanta suvRRidha.m nadiiShvaa.N ushantama.mshu.m pariyantamRRigmiyam .
Component Words : mandrasya . ruupam . vividuH . maniiShiNaH . shyenaH . yat . andhaH . abharat . paraa.avataH . tam . marjayanta . su.avRRidham . nadiiShu . aa . ushantam . a.mshum . pari.ayantam . RRIgmiyam . 9.68.6
In Hindi:
ऋषि : वत्सप्रिर्भालन्दनः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः
विषय :
पदपाठ : म॒न्द्रस्य॑ । रू॒पम् । वि॒वि॒दुः॒ । म॒नी॒षिणः॑ । श्ये॒नः । यत् । अन्धः॑ । अभ॑रत् । प॒रा॒ऽवतः॑ । तम् । म॒र्ज॒य॒न्त॒ । सु॒ऽवृध॑म् । न॒दीषु॑ । आ । उ॒शन्त॑म् । अं॒शुम् । प॒रि॒ऽयन्त॑म् । ऋ॒ग्मिय॑म् ॥ ९.६८.६
पदार्थ : (मन्द्रस्य) आनन्दस्वरूप परमात्मा के (रूपं) रूप को (मनीषिणः) मेधावी लोग (विविदुः) जानते हैं। जो परमात्मा (परावतः) सब लोक-लोकान्तरों की (अभरत्) उत्पत्ति स्थिति और प्रलय करनेवाला है और (श्येनः) जो विद्युत् के समान (यदन्धः) सर्वव्यापक है, (तं) उस (ऋग्मियं) स्तवनीय (अंशुं) प्रकाशस्वरूप (सुवृधं) बढ़े हुए (उशन्तं) कान्तिवाले (परियन्तं) सर्वव्यापक परमात्मा का हम लोग (नदीषु) वेदवाणियों से (आ मर्जयन्त) साक्षात्कार करते हैं ॥६॥
भावार्थ : आनन्दमय परमात्मा का साक्षात्कार कर्मयोग और ज्ञानयोग द्वारा संस्कृत बुद्धि से ही हो सकता है, अन्यथा नहीं। इसी अभिप्राय से कहा है कि “दृश्यते त्वग्र्या बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः” उसको सूक्ष्म बुद्धि से सूक्ष्मदर्शी ही देख सकते हैं, अन्य नहीं ॥६॥
In Sanskrit:
ऋषि : वत्सप्रिर्भालन्दनः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः
पदपाठ : म॒न्द्रस्य॑ । रू॒पम् । वि॒वि॒दुः॒ । म॒नी॒षिणः॑ । श्ये॒नः । यत् । अन्धः॑ । अभ॑रत् । प॒रा॒ऽवतः॑ । तम् । म॒र्ज॒य॒न्त॒ । सु॒ऽवृध॑म् । न॒दीषु॑ । आ । उ॒शन्त॑म् । अं॒शुम् । प॒रि॒ऽयन्त॑म् । ऋ॒ग्मिय॑म् ॥ ९.६८.६
भावार्थ :