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Rigveda / 9 / 68 / 9

अ॒यं दि॒व इ॑यर्ति॒ विश्व॒मा रज॒: सोम॑: पुना॒नः क॒लशे॑षु सीदति । अ॒द्भिर्गोभि॑र्मृज्यते॒ अद्रि॑भिः सु॒तः पु॑ना॒न इन्दु॒र्वरि॑वो विदत्प्रि॒यम् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 68 | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : वत्सप्रिर्भालन्दनः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : अ॒यम् । दि॒वः । इ॒य॒र्ति॒ । विश्व॑म् । आ । रजः॑ । सोमः॑ । पु॒ना॒नः । क॒लशे॑षु । सी॒द॒ति॒ । अ॒त्ऽभिः । गोभिः॑ । मृ॒ज्य॒ते॒ । अद्रि॑ऽभिः । सु॒तः । पु॒ना॒नः । इन्दुः॑ । वरि॑ऽवः । वि॒द॒त् । प्रि॒यम् ॥ ९.६८.९

पदार्थ : (अयं सोमः) यह परमात्मा (दिवः) द्युलोक के (विश्वं) सम्पूर्ण (रजः) ऐश्वर्य को (इयर्ति) देता है और (कलशेषु) समस्त अन्तःकरणों में (पुनानः) पवित्र करता हुआ (आ सीदति) विराजमान है। तथा (अद्रिभिः) इन्द्रियवृत्तियों से (अद्भिः गोभिः) ज्ञान और कर्मों द्वारा (मृज्यते) साक्षात्कार किया जाता है और (सुतः) स्वयंसिद्ध (इन्दुः) परमैश्वर्यवान् (पुनानः) पवित्रकर्ता परमात्मा (प्रियं) प्रियकारक (वरिवः) वरणीय ऐश्वर्य को ज्ञानयोगी और कर्मयोगियों को (विदत्) देता है ॥९॥

भावार्थ : ज्ञानयोगी और कर्मयोगी को परमात्मा अनन्त प्रकार के ऐश्वर्य देता है ॥९॥