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Rigveda / 9 / 69 / 10

इन्द॒विन्द्रा॑य बृह॒ते प॑वस्व सुमृळी॒को अ॑नव॒द्यो रि॒शादा॑: । भरा॑ च॒न्द्राणि॑ गृण॒ते वसू॑नि दे॒वैर्द्या॑वापृथिवी॒ प्राव॑तं नः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 69 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : हिरण्यस्तूपः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : इन्दो॒ इति॑ । इन्द्रा॑य । बृ॒ह॒ते । प॒व॒स्व॒ । सु॒ऽमृ॒ळी॒कः । अ॒न॒व॒द्यः । रि॒शादाः॑ । भर॑ । च॒न्द्राणि॑ । गृ॒ण॒ते । वसू॑नि । दे॒वैः । द्या॒वा॒पृ॒थि॒वी॒ इति॑ । प्र । अ॒व॒त॒म् । नः॒ ॥ ९.६९.१०

पदार्थ : (इन्दो) ऐश्वर्यसंपन्न परमात्मन् ! (सुमृळीकः) कर्मयोगी को सुख देनेवाले (अनवद्यः) निन्दारहित (रिशादाः) बाधकों के नाशक आप (इन्द्राय) कर्मयोगी के लिए (पवस्व) पवित्रता प्रदान करें और (गृणते) स्तुति करनेवाले कर्मयोगी के लिए (चन्द्राणि) आह्लाद देनेवाले (वसूनि) धनों को (भर) प्रदान करें। आप (देवैः) दिव्य धनों के सहित (द्यावापृथिवी) द्युलोक और पृथिवीलोक को (नः) हम लोगों के लिए (प्र अवतं) प्राप्त कराएँ ॥१०॥

भावार्थ : इस मन्त्र में कर्मयोगी के लिए ऐश्वर्यप्रदान का वर्णन किया गया है ॥१०॥ यह ६९ वाँ सूक्त और २२ वाँ वर्ग समाप्त हुआ।