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Rigveda / 9 / 70 / 3

ते अ॑स्य सन्तु के॒तवोऽमृ॑त्य॒वोऽदा॑भ्यासो ज॒नुषी॑ उ॒भे अनु॑ । येभि॑र्नृ॒म्णा च॑ दे॒व्या॑ च पुन॒त आदिद्राजा॑नं म॒नना॑ अगृभ्णत ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 70 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : रेनुर्वैश्वामित्रः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : ते । अ॒स्य॒ । स॒न्तु॒ । के॒तवः॑ । अमृ॑त्यवः । अदा॑भ्यासः । ज॒नुषी॒ इति॑ । उ॒भे इति॑ । अनु॑ । येभिः॑ । नृ॒म्णा । च॒ । दे॒व्या॑ । च॒ । पु॒न॒ते । आत् । इत् । राजा॑नम् । म॒ननाः॑ । अ॒गृ॒भ्ण॒त॒ ॥ ९.७०.३

पदार्थ : (ते) वे (अमृत्यवः) मरणधर्रहित (अदाभ्यासः) अदम्भनीय पूर्वोक्त तत्त्ववेत्ता लोग (अस्य) इस संसार के (केतवः) मौलिकमणिस्थानी (सन्तु) हों। (उभे जनुषी) दोनों जन्मों को (अनु) लक्ष्य करके (देव्या नृम्णा) दिव्यकर्म (येभिः) जिनसे किये जाते हैं, वे ही लोग (पुनते) संसार को पवित्र करते हैं (च) और (आदित्) वे ही (मननाः) माननीय (राजानम्) प्रकाशरूप परमात्मा को (अगृभ्णत) ग्रहण करते हैं ॥३॥

भावार्थ : जो लोग लोक और परलोक को लक्ष्य रखकर शुभ कर्म करते हैं, वे ही परमात्मा के ज्ञानपात्र हो सकते हैं, अन्य नहीं ॥३॥