Rigveda / 9 / 70 / 7
रु॒वति॑ भी॒मो वृ॑ष॒भस्त॑वि॒ष्यया॒ शृङ्गे॒ शिशा॑नो॒ हरि॑णी विचक्ष॒णः । आ योनिं॒ सोम॒: सुकृ॑तं॒ नि षी॑दति ग॒व्ययी॒ त्वग्भ॑वति नि॒र्णिग॒व्ययी॑ ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 70 | Mantra No : 7
In English:
Seer : renurvaishvaamitraH | Devta : pavamaanaH somaH | Metre : jagatii | Tone : niShaadaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : ruvati bhiimo vRRiShabhastaviShyayaa shRRi~Nge shishaano hariNii vichakShaNaH . aa yoni.m somaH sukRRita.m ni Shiidati gavyayii tvagbhavati nirNigavyayii .
Component Words : ruvati . bhiimaH . vRRiShabhaH . taviShyayaa . shRRi~Nge iti . shishaanaH . hariNii iti . vi.achakShaNaH . aa . yonim . somaH . su.akRRitam . ni . siidati . gavyayii . tvak . bhavati . niH.anik . avyayii . 9.70.7
In Hindi:
ऋषि : रेनुर्वैश्वामित्रः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः
विषय :
पदपाठ : रु॒वति॑ । भी॒मः । वृ॒ष॒भः । त॒वि॒ष्यया॑ । शृङ्गे॒ इति॑ । शिशा॑नः । हरि॑णी॒ इति॑ । वि॒ऽच॒क्ष॒णः । आ । योनि॑म् । सोमः॑ । सुऽकृ॑तम् । नि । सी॒द॒ति॒ । ग॒व्ययी॑ । त्वक् । भ॒व॒ति॒ । निः॒ऽनिक् । अ॒व्ययी॑ ॥ ९.७०.७
पदार्थ : जिस कर्मयोगी की (गव्ययी) सत् असत् का निर्णय करनेवाली (त्वक्) चैतन्यशक्ति (निर्णिगव्ययी) परिशोधन करनेवाली और रक्षा करनेवाली (भवति) होती है, उस (सुकृतम्) सुकृती कर्मयोगी के हृदय को (योनिम्) स्थान बनाकर (तविष्यया) वृद्धि की इच्छा से (भीमः) दुष्ट को भयदाता (वृषभः) कर्मों का वर्षक (विचक्षणः) सर्वज्ञ (सोमः) परमात्मा (आ नि सीदति) निवास करता है और (हरिणी) अविद्या की हरण करनेवाली (शृङ्गे) दो दीप्तियों को (शिशानः) तीक्ष्ण करता हुआ (रुवति) शब्द-स्पर्शादिकों के आश्रयभूत पञ्चतत्त्वों को उत्पन्न करता है ॥७॥
भावार्थ : परमात्मा जीवरूपी शक्ति और प्रकृतिरूपी शक्ति दोनों का अधिष्ठाता है, वा यों कहो कि उक्त दोनों दीप्तियों को उत्पन्न करके परमात्मा इस ब्रह्माण्ड की रचना करता है ॥७॥
In Sanskrit:
ऋषि : रेनुर्वैश्वामित्रः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः
पदपाठ : रु॒वति॑ । भी॒मः । वृ॒ष॒भः । त॒वि॒ष्यया॑ । शृङ्गे॒ इति॑ । शिशा॑नः । हरि॑णी॒ इति॑ । वि॒ऽच॒क्ष॒णः । आ । योनि॑म् । सोमः॑ । सुऽकृ॑तम् । नि । सी॒द॒ति॒ । ग॒व्ययी॑ । त्वक् । भ॒व॒ति॒ । निः॒ऽनिक् । अ॒व्ययी॑ ॥ ९.७०.७
भावार्थ :