Rigveda / 9 / 70 / 10
हि॒तो न सप्ति॑र॒भि वाज॑म॒र्षेन्द्र॑स्येन्दो ज॒ठर॒मा प॑वस्व । ना॒वा न सिन्धु॒मति॑ पर्षि वि॒द्वाञ्छूरो॒ न युध्य॒न्नव॑ नो नि॒दः स्प॑: ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 70 | Mantra No : 10
In English:
Seer : renurvaishvaamitraH | Devta : pavamaanaH somaH | Metre : nichRRijjagatii | Tone : niShaadaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : hito na saptirabhi vaajamarShendrasyendo jaTharamaa pavasva . naavaa na sindhumati parShi vidvaa~nChuuro na yudhyannava no nidaH spaH .
Component Words : hitaH . na . saptiH . abhi . vaajam . arSha . ndrasya . indo iti . jaTharam . aa . pavasva . naavaa . na . sindhum . ati . parShi . vidvaan . shuuraH . na . yudhyan . ava . naH . nidaH . spariti spaH . 9.70.10
In Hindi:
ऋषि : रेनुर्वैश्वामित्रः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः
विषय :
पदपाठ : हि॒तः । न । सप्तिः॑ । अ॒भि । वाज॑म् । अ॒र्ष॒ । न्द्र॑स्य । इ॒न्दो॒ इति॑ । ज॒ठर॑म् । आ । प॒व॒स्व॒ । ना॒वा । न । सिन्धु॑म् । अति॑ । प॒र्षि॒ । वि॒द्वान् । शूरः॑ । न । युध्य॑न् । अव॑ । नः॒ । नि॒दः । स्प॒रिति॑ स्पः॑ ॥ ९.७०.१०
पदार्थ : (इन्दो) परमैश्वर्यसम्पन्न परमात्मन् ! (नावा न) जैसे नाविक जन (सिन्धुम्) नदी को (अति पर्षि) पार करते हैं, ऐसे आप हमको संसारसागर से पार करें। (विद्वान् शूरो न) और जैसे विद्वान् शूरवीर (युध्यन्) युद्ध करता हुआ (नः) हम लोगों के (निदः) निन्दकों को (अवस्पः) मारता है, इसी तरह आप दुष्टों को दमन कर श्रेष्ठों को उबारें और (सप्तिः न) जैसे सूर्य (वाजं) ऐश्वर्य को उत्पन्न करता हुआ (अभ्यर्ष) अपने लक्ष्य को प्राप्त होता है, इसी प्रकार आप (इन्द्रस्य) कर्मयोगी के (जठरं) हृदय में ज्ञानरूपी सत्ता से विराजमान होकर (आ पवस्व) पवित्र करें ॥१०॥
भावार्थ : परमात्मा सूर्य के समान अज्ञानरूप अन्धकार को दूर करके हमारे हृदय में ज्ञानदीप्ति का प्रकाश करता है ॥१०॥ यह ७० वाँ सूक्त और २४ वाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : रेनुर्वैश्वामित्रः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः
पदपाठ : हि॒तः । न । सप्तिः॑ । अ॒भि । वाज॑म् । अ॒र्ष॒ । न्द्र॑स्य । इ॒न्दो॒ इति॑ । ज॒ठर॑म् । आ । प॒व॒स्व॒ । ना॒वा । न । सिन्धु॑म् । अति॑ । प॒र्षि॒ । वि॒द्वान् । शूरः॑ । न । युध्य॑न् । अव॑ । नः॒ । नि॒दः । स्प॒रिति॑ स्पः॑ ॥ ९.७०.१०
भावार्थ :