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Rigveda / 9 / 74 / 9

अ॒द्भिः सो॑म पपृचा॒नस्य॑ ते॒ रसोऽव्यो॒ वारं॒ वि प॑वमान धावति । स मृ॒ज्यमा॑नः क॒विभि॑र्मदिन्तम॒ स्वद॒स्वेन्द्रा॑य पवमान पी॒तये॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 74 | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : कक्षीवान् | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : अ॒त्ऽभिः । सो॒म॒ । प॒पृ॒चा॒नस्य॑ । ते॒ । रसः॑ । अव्यः॑ । वार॑म् । वि । प॒व॒मा॒न॒ । धा॒व॒ति॒ । सः । मृ॒ज्यमा॑नः । क॒विऽभिः॑ । म॒दि॒न्ऽत॒म॒ । स्वद॑स्व । इन्द्रा॑य । प॒व॒मा॒न॒ । पी॒तये॑ ॥ ९.७४.९

पदार्थ : (अद्भिः) सत्कर्मों से (पपृचानस्य) अभिव्यक्त (ते) आपका (रसः) आनन्द (अव्यः) जो सर्वरक्षक है, वह (वारं) वरणीय पुरुष के प्रति (वारम्) विशेषरूप से प्राप्त होता है। (विधावति) सबको पवित्र करनेवाले (पवमान) परमात्मन् ! आप (कविभिः) विद्वानों से (मृज्यमानः) साक्षात्कृत हैं और (पवमान) पवित्र करनेवाले हैं और (मदिन्तम) सबको आह्लादकारक आप (इन्द्राय) कर्मयोगी की (पीतये) तृप्ति के लिये (स्वदस्व) प्रियकारक हों ॥९॥

भावार्थ : जो लोग कर्मयोग से अपने को पवित्र बनाते हैं, उनके लिये परमात्मा अवश्यमेव अपने ब्रह्मामृत का प्रदान करते हैं ॥९॥ यह ७४ वाँ सूक्त और ३२ वाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥