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Rigveda / 9 / 75 / 4

अद्रि॑भिः सु॒तो म॒तिभि॒श्चनो॑हितः प्ररो॒चय॒न्रोद॑सी मा॒तरा॒ शुचि॑: । रोमा॒ण्यव्या॑ स॒मया॒ वि धा॑वति॒ मधो॒र्धारा॒ पिन्व॑माना दि॒वेदि॑वे ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 75 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : कविः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : अद्रि॑ऽभिः । सु॒तः । म॒तिऽभिः । चनः॑ऽहितः । प्र॒ऽरो॒चय॑न् । रोद॑सी॒ इति॑ । मा॒तरा॑ । शुचिः॑ । रोमा॑णि । अव्या॑ । स॒मया॑ । वि । धा॒व॒ति॒ । मधोः॑ । धारा॑ । पिन्व॑माना । दि॒वेऽदि॑वे ॥ ९.७५.४

पदार्थ : (रोदसी मातरा) इस संसार के मातापितावत् वर्त्तमान जो द्युलोक और पृथिवीलोक हैं, उनको (प्ररोचयन्) प्रकाश करता हुआ (च) और (मतिभिः अद्रिभिः) ज्ञानरूपी चित्तवृत्तियों से (सुतः) संस्कृत और (चनोहितः) सबका हितकारी (शुचिः) शुद्धस्वरूप परमात्मा (समया) सब ओर से (रोमाण्यव्या) सब पदार्थों की रक्षा करता हुआ (विधावति) विशेषरूप से गति करता है। (दिवेदिवे) प्रतिदिन (मधोः धारा) अमृतवृष्टि से (पिन्वमाना) पुष्ट करता है ॥४॥

भावार्थ : द्युलोक और पृथिव्यादि लोक-लोकान्तरों का प्रकाशक परमात्मा अपनी सुधामयी-वृष्टि से सदैव पवित्र करता है ॥४॥