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Rigveda / 9 / 76 / 2

शूरो॒ न ध॑त्त॒ आयु॑धा॒ गभ॑स्त्यो॒: स्व१॒॑: सिषा॑सन्रथि॒रो गवि॑ष्टिषु । इन्द्र॑स्य॒ शुष्म॑मी॒रय॑न्नप॒स्युभि॒रिन्दु॑र्हिन्वा॒नो अ॑ज्यते मनी॒षिभि॑: ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 76 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : कविः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : विराड्जगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : शूरः॑ । न । ध॒त्ते॒ । आयु॑धा । गभ॑स्त्योः । स्व१॒॑रिति॑ स्वः॑ । सिसा॑सन् । र॒थि॒रः । गोऽइ॑ष्टिषु । इन्द्र॑स्य । शुष्म॑म् । ई॒रय॑न् । अ॒प॒स्युऽभिः॑ । इन्दुः॑ । हि॒न्वा॒नः । अ॒ज्य॒ते॒ । म॒नी॒षिऽभिः॑ ॥ ९.७६.२

पदार्थ : (इन्दुः) सर्वप्रकाशक परमात्मा (मनीषिभिः) ज्ञानयोगियों द्वारा (अज्यते) ध्यानविषय किया जाता है। (अपस्युभिः) कर्मयोगियों द्वारा (हिन्वानः) प्रेरणा किया हुआ तथा (इन्द्रस्य) कर्मयोगी के (शुष्मम्) बल को (ईरयन्) प्रेरणा करता हुआ (शूरः न) शूरवीर के समान (गभस्त्योः) अपने कर्म और ज्ञानरूप शक्ति में (आयुधा) सृष्टि के करणोपकरणरूप आयुधों को (धत्त) धारण करता है। (स्वः) वह सुखस्वरूप परमात्मा (गविष्टिषु) प्रजाओं में (सिषासन्) विभाग करने की इच्छा से (रथिरः) गतिस्वरूप परमात्मा अपनी गति से सर्वत्र परिपूर्ण होता है ॥२॥

भावार्थ : परमात्मा कर्मों के फल देने के अभिप्राय से सर्वत्र सृष्टि में अपनी न्यायरूपी शक्ति से सम्पूर्ण प्रजा में विराजमान होकर कर्मों के यथायोग्य फल देता है ॥२॥