Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 9 / 77 / 5

चक्रि॑र्दि॒वः प॑वते॒ कृत्व्यो॒ रसो॑ म॒हाँ अद॑ब्धो॒ वरु॑णो हु॒रुग्य॒ते । असा॑वि मि॒त्रो वृ॒जने॑षु य॒ज्ञियोऽत्यो॒ न यू॒थे वृ॑ष॒युः कनि॑क्रदत् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 77 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : कविः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : चक्रिः॑ । दि॒वः । प॒व॒ते॒ । कृत्व्यः॑ । रसः॑ । म॒हान् । अद॑ब्धः । वरु॑णः । हु॒रुक् । य॒ते । असा॑वि । मि॒त्रः । वृ॒जने॑षु । य॒ज्ञियः॑ । अत्यः॑ । न । यू॒थे । वृ॒ष॒ऽयुः । कनि॑क्रदत् ॥ ९.७७.५

पदार्थ : (चक्रिः) वह पुरुष अनुष्ठानपरायण होता है और (दिवः) द्युलोक को (पवते) पवित्र करता है (कृत्व्यः) और कर्तव्यशील (रसः) आनन्दस्वरूप (महान्) बड़ा (अदब्धः) किसी से न दबाये जानेवाला परमेश्वर (हुरुग्यते) कुटिलता से चलनेवाले पुरुष को (वरुणः) अपने विद्याबल से आच्छादन करता है और (असावि) ज्ञानरूपी बल को उत्पन्न करता है (मित्रः) सर्वमित्र है (वृजनेषु) सब विषयों में (अत्यः) गमन कर सकता है (यज्ञियः) और यज्ञसम्बन्धी कर्म्मों में योग्य (वृषयुः) सब कामनाओं के (यूथे) देनेवाले गण के (न) समान (कनिक्रदत्) गर्जता हुआ इस संसार में यात्रा करता है ॥५॥

भावार्थ : जो विद्वान् धीर, वीर, दृढव्रती और अपने विद्याप्रभाव से कुटिल वा मायावी पुरुषों को दबाने की शक्ति रखता है। वह इस मनुष्यसमाज में वृषभ के समान गर्जता हुआ अपने सदाचारी समाज की रक्षा करता है ॥५॥ यह ७७ वाँ सूक्त और दूसरा वर्ग समाप्त हुआ ॥