Rigveda / 9 / 79 / 4
दि॒वि ते॒ नाभा॑ पर॒मो य आ॑द॒दे पृ॑थि॒व्यास्ते॑ रुरुहु॒: सान॑वि॒ क्षिप॑: । अद्र॑यस्त्वा बप्सति॒ गोरधि॑ त्व॒च्य१॒॑प्सु त्वा॒ हस्तै॑र्दुदुहुर्मनी॒षिण॑: ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 79 | Mantra No : 4
In English:
Seer : kaviH | Devta : pavamaanaH somaH | Metre : nichRRijjagatii | Tone : niShaadaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : divi te naabhaa paramo ya aadade pRRithivyaaste ruruhuH saanavi kShipaH . adrayastvaa bapsati goradhi tvachya1psu tvaa hastairduduhurmaniiShiNaH .
Component Words : divi . te . naabhaa . paramaH . yaH . aa.adade . pRRithivyaaH . te . ruruhuH . saanavi . kShipaH . adrayaH . tvaa . bapsati . goH . adhi . tvachi . ap.asu . tvaa . hastaiH . duduhuH . maniiShiNaH . 9.79.4
In Hindi:
ऋषि : कविः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः
विषय :
पदपाठ : दि॒वि । ते॒ । नाभा॑ । प॒र॒मः । यः । आ॒ऽद॒दे । पृ॒थि॒व्याः । ते॒ । रु॒रु॒हुः॒ । सान॑वि । क्षिपः॑ । अद्र॑यः । त्वा॒ । ब॒प्स॒ति॒ । गोः । अधि॑ । त्व॒चि । अ॒प्ऽसु । त्वा॒ । हस्तैः॑ । दु॒दु॒हुः॒ । म॒नी॒षिणः॑ ॥ ९.७९.४
पदार्थ : (मनीषिणः) मेधावी लोग (त्वा) तुमको (हस्तैः) ज्ञानयोग कर्म्मयोगादि साधनों द्वारा (दुदुहुः) साक्षात्कार करते हैं और उनकी (अद्रयः) चित्तवृत्तियाँ (गोरधि त्वचि) अपने मन से (अप्सु) कर्म्मों के लिये (त्वा) तुमको (बप्सति) ग्रहण करती हैं। हे सोम ! (ते) तुम्हारे (दिवि नाभा) लोक-लोकान्तरों के बन्धनरूप द्युलोक में (यः) जो पुरुष (आददे) तुमको ग्रहण करता है, वह (परमः) सर्वोत्कृष्ट होता है और (ते) तुम्हारे (पृथिव्याः) पृथिवीलोक के (सानवि) उच्चशिखर में (क्षिपः) रक्खा हुआ (रुरुहुः) उत्पन्न होता है ॥४॥
भावार्थ : जो लोग चित्तवृत्तिनिरोध द्वारा परमात्मा का साक्षात्कार करते हैं, वे परमात्मा की विभूति में सर्वोपरि होकर विराजमान होते हैं ॥४॥
In Sanskrit:
ऋषि : कविः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः
पदपाठ : दि॒वि । ते॒ । नाभा॑ । प॒र॒मः । यः । आ॒ऽद॒दे । पृ॒थि॒व्याः । ते॒ । रु॒रु॒हुः॒ । सान॑वि । क्षिपः॑ । अद्र॑यः । त्वा॒ । ब॒प्स॒ति॒ । गोः । अधि॑ । त्व॒चि । अ॒प्ऽसु । त्वा॒ । हस्तैः॑ । दु॒दु॒हुः॒ । म॒नी॒षिणः॑ ॥ ९.७९.४
भावार्थ :