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Rigveda / 1 / 169 / 4

त्वं तू न॑ इन्द्र॒ तं र॒यिं दा॒ ओजि॑ष्ठया॒ दक्षि॑णयेव रा॒तिम्। स्तुत॑श्च॒ यास्ते॑ च॒कन॑न्त वा॒योः स्तनं॒ न मध्व॑: पीपयन्त॒ वाजै॑: ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 169 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : अगस्त्यो मैत्रावरुणिः | देवता : इन्द्र: | छन्द : ब्राह्म्युष्निक् | स्वर : ऋषभः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : त्वम्। तु। नः॒। इ॒न्द्र॒। तम्। र॒यिम्। दाः॒। ओजि॑ष्ठया। दक्षि॑णयाऽइव। रा॒तिम्। स्तुतः॑। च॒। याः। ते॒। च॒कन॑न्त। वा॒योः। स्तन॑म्। न। मध्वः॑। पी॒प॒य॒न्त॒। वाजैः॑ ॥ १.१६९.४

पदार्थ : हे (इन्द्र) बहुत पदार्थों के देनेवाले ! (त्वम्) आप (तु) तो (नः) हमारे लिये (ओजिष्ठया) अतीव बलवती (दक्षिणयेव) दक्षिणा के साथ दान जैसे दिया जाय वैसे (रातिम्) दान को तथा (तम्) उस (रयिम्) दुग्धादि धन को (दाः) दीजिये कि जिससे (ते) आपकी और (वायोः) पवन की (च) भी (याः) जो (स्तुतः) स्तुति करनेवाली हैं वे (मध्वः) मधुर उत्तम (स्तनम्) दूध के भरे हुए स्तन के (न) समान (चकनन्त) चाहती और (वाजैः) अन्नादिकों के साथ (पीपयन्त) बछरों को पिलाती हैं ॥ ४ ॥

भावार्थ : जैसे बहुत पदार्थों को देनेवाला यजमान ऋतु-ऋतु में यज्ञादि करानेवाले पुरोहित के लिये बहुत धन देकर उसको सुशोभित करता है वा जैसे पुत्र माता का दूध पीके पुष्ट हो जाते हैं, वैसे सभाध्यक्ष के परितोष से भृत्यजन पूर्ण धनी और उनके दिये भोजनादि पदार्थों से बलवान् होते हैं ॥ ४ ॥