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Rigveda / 9 / 80 / 3

एन्द्र॑स्य कु॒क्षा प॑वते म॒दिन्त॑म॒ ऊर्जं॒ वसा॑न॒: श्रव॑से सुम॒ङ्गल॑: । प्र॒त्यङ्स विश्वा॒ भुव॑ना॒भि प॑प्रथे॒ क्रीळ॒न्हरि॒रत्य॑: स्यन्दते॒ वृषा॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 80 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : वसुर्भारद्वाजः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : आ । इन्द्र॑स्य । कु॒क्षा । प॒व॒ते॒ । म॒दिन्ऽत॑मः । ऊर्ज॑म् । वसा॑नः । श्रव॑से । सु॒ऽम॒ङ्गलः॑ । प्र॒त्यङ् । सः । विश्वा॑ । भुव॑ना । अ॒भि । प॒प्र॒थे॒ । क्रीळ॑न् । हरिः॑ । अत्यः॑ । स्य॒न्द॒ते॒ । वृषा॑ ॥ ९.८०.३

पदार्थ : (श्रवसे) सर्वोपरि बल के लिये (सुमङ्गलः) मङ्गलरूप है। (ऊर्जं वसानः) सबका प्राणाधार होकर विराजमान हो रहा है। (मदिन्तमः) सबका आनन्दकारक है। (इन्द्रस्य) कर्मयोगी के (कुक्षा) अन्तःकरण में (आ पवते) पवित्रता प्रदान करता है, (सः) वह परमात्मा (प्रत्यङ्) सर्वव्यापक है और (विश्वा भुवना) सम्पूर्ण लोक-लोकान्तरों को (अभि पप्रथे) रचता है। (हरिः) वह अनन्तबलयुक्त परमात्मा (क्रीळन्) क्रीडा करता हुआ और (अत्यः) सर्वव्यापक होकर और (वृषा) आनन्द का वर्षक होकर (स्यन्दते) अपनी व्यापक शक्ति द्वारा सर्वत्र परिपूर्ण हो रहा है ॥३॥

भावार्थ :