Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 1 / 169 / 6

प्रति॒ प्र या॑हीन्द्र मी॒ळ्हुषो॒ नॄन्म॒हः पार्थि॑वे॒ सद॑ने यतस्व। अध॒ यदे॑षां पृथुबु॒ध्नास॒ एता॑स्ती॒र्थे नार्यः पौंस्या॑नि त॒स्थुः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 169 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : अगस्त्यो मैत्रावरुणिः | देवता : इन्द्र: | छन्द : स्वराट्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : प्रति॑। प्र। या॒हि॒। इ॒न्द्र॒। मी॒ळ्हुषः॑। नॄन्। म॒हः। पार्थि॑वे। सद॑ने। य॒त॒स्व॒। अध॑। यत्। ए॒षा॒म्। पृ॒थु॒ऽबु॒ध्नासः॑। एताः॑। ती॒र्थे। न। अ॒र्यः। पौंस्या॑नि। त॒स्थुः ॥ १.१६९.६

पदार्थ : हे (इन्द्र) प्रयत्न करनेवाले ! आप (यत्) जो (पृथुबुध्नासः) विस्तारयुक्त अन्तरिक्षवाले जन (एताः) ये स्त्रीजन और (एषाम्) इनके (पौंस्यानि) बल (तीर्थे) जिससे समुद्ररूप जल समूहों को तरें उस नौका में (अर्यः) वैश्य के (न) समान (तस्थुः) स्थिर होते हैं उन (मीढुषः) सुखों से सींचनेवाले (नॄन्) अग्रगामी मनुष्यों को (प्रति) (प्र, याहि) प्राप्त होओ (अध) इसके अनन्तर (महः) बड़े (पार्थिवे) पृथिवी में विदित (सदने) घर में (यतस्व) यत्न करो ॥ ६ ॥

भावार्थ : जो पुरुष और जो स्त्री ब्रह्मचर्य से बलों को बढ़ाकर आप्त धर्म्मात्मा शास्त्रवक्ता सज्जनों की सेवा करते हैं, वे पुरुष विद्वान् और वे स्त्रियाँ विदुषी होती हैं ॥ ६ ॥