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Rigveda / 9 / 84 / 3

आ यो गोभि॑: सृ॒ज्यत॒ ओष॑धी॒ष्वा दे॒वानां॑ सु॒म्न इ॒षय॒न्नुपा॑वसुः । आ वि॒द्युता॑ पवते॒ धार॑या सु॒त इन्द्रं॒ सोमो॑ मा॒दय॒न्दैव्यं॒ जन॑म् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 84 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : प्रजापतिर्वाच्यः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : विराड्जगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : आ । यः । गोभिः॑ । सृ॒ज्यते॑ । ओष॑धीषु । आ । दे॒वाना॑म् । सु॒म्ने । इ॒षय॑न् । उप॑ऽवसुः । आ । वि॒ऽद्युता॑ । प॒व॒ते॒ । धार॑या । सु॒तः । इन्द्र॑म् । सोमः॑ । मा॒दय॑न् । दैव्य॑म् । जन॑म् ॥ ९.८४.३

पदार्थ : (सोमः) परमात्मा (दैव्यं, जनं) दिव्यगुणवाले (इन्द्रं) कर्म्मयोगी को (मादयन्) आनन्दित करता हुआ (उपावसुः) स्थिर होता है। (यः) जो परमात्मा (गोभिः) पृथिव्यादिकों की सूक्ष्म पञ्चतन्मात्राओं से लेकर (ओषधीषु, आ) ओषधियों तक (आसृज्यते) सब ब्रह्माण्डों को रचता हुआ और (देवानां) विद्वानों के (सुम्ने) सुख के लिये (इषयन्) इच्छा करता हुआ (विद्युता) विद्युत् रूपी शक्ति से सबको पवित्र करता है और (धारया, सुतः) सुधामय है ॥३॥

भावार्थ : जो विद्वान् पुरुष ईश्वरीय विद्या को प्राप्त होकर संसार की रक्षा करना चाहते हैं, परमात्मा उनके सुख की सदैव वृद्धि करता है ॥३॥