Rigveda / 9 / 84 / 5
अ॒भि त्यं गाव॒: पय॑सा पयो॒वृधं॒ सोमं॑ श्रीणन्ति म॒तिभि॑: स्व॒र्विद॑म् । ध॒नं॒ज॒यः प॑वते॒ कृत्व्यो॒ रसो॒ विप्र॑: क॒विः काव्ये॑ना॒ स्व॑र्चनाः ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 84 | Mantra No : 5
In English:
Seer : prajaapatirvaachyaH | Devta : pavamaanaH somaH | Metre : triShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : abhi tya.m gaavaH payasaa payovRRidha.m soma.m shriiNanti matibhiH svarvidam . dhana.mjayaH pavate kRRitvyo raso vipraH kaviH kaavyenaa svarchanaaH .
Component Words : abhi . tyam . gaavaH . payasaa . payaH.avRRidham . somam . shriiNanti . mati.abhiH . svaH.avidam . dhanam.ajayaH . pavate . kRRitvyaH . rasaH . vipraH . kaviH . kaavyena . svaH.achanaaH . 9.84.5
In Hindi:
ऋषि : प्रजापतिर्वाच्यः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय :
पदपाठ : अ॒भि । त्यम् । गावः॑ । पय॑सा । प॒यः॒ऽवृध॑म् । सोम॑म् । श्री॒ण॒न्ति॒ । म॒तिऽभिः॑ । स्वः॒ऽविद॑म् । ध॒न॒म्ऽज॒यः । प॒व॒ते॒ । कृत्व्यः॑ । रसः॑ । विप्रः॑ । क॒विः । काव्ये॑न । स्वः॑ऽचनाः ॥ ९.८४.५
पदार्थ : हे परमात्मन् ! (पयोवृधं) ज्ञान से वृद्धि को प्राप्त जो आप हैं, (त्यं) उस आपको (गावः) इन्द्रियें (पयसा) ज्ञान द्वारा (अभि, श्रीणन्ति) सेवन करती हैं और (सोमं) सोमगुणविशिष्ट आपको, (स्वर्विदं) जो आप देवताओं के लक्ष्यस्थानीय हैं, (मतिभिः) ब्रह्मविषयिणी बुद्धि द्वारा (पवते) विद्वान् लोग साक्षात्कार करते हैं। (धनञ्जय) आप धनञ्जय हैं। सम्पूर्ण धनों के जेता हैं। (कृत्व्यः) सब शक्तियों के केन्द्र हैं। (रसः) आनन्दरूप हैं। (विप्रः) मेधावी हैं। (कविः) सर्वज्ञ हैं। (काव्येन, स्वर्चनाः) अपनी सर्वशक्ति से सब लोक-लोकान्तरों के प्रलयकर्ता हैं ॥५॥
भावार्थ : जो परमात्मा पूर्वोक्त गुणों से सम्पन्न है, उसका ज्ञानयोगी अपने चित्तवृत्तिनिरोधरूपी योगद्वारा साक्षात्कार करते हैं ॥७॥ यह ८४ वाँ सूक्त और नवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : प्रजापतिर्वाच्यः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
पदपाठ : अ॒भि । त्यम् । गावः॑ । पय॑सा । प॒यः॒ऽवृध॑म् । सोम॑म् । श्री॒ण॒न्ति॒ । म॒तिऽभिः॑ । स्वः॒ऽविद॑म् । ध॒न॒म्ऽज॒यः । प॒व॒ते॒ । कृत्व्यः॑ । रसः॑ । विप्रः॑ । क॒विः । काव्ये॑न । स्वः॑ऽचनाः ॥ ९.८४.५
भावार्थ :