Rigveda / 9 / 86 / 6
उ॒भ॒यत॒: पव॑मानस्य र॒श्मयो॑ ध्रु॒वस्य॑ स॒तः परि॑ यन्ति के॒तव॑: । यदी॑ प॒वित्रे॒ अधि॑ मृ॒ज्यते॒ हरि॒: सत्ता॒ नि योना॑ क॒लशे॑षु सीदति ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 86 | Mantra No : 6
In English:
Seer : akRRiShTaa maaShaaH | Devta : pavamaanaH somaH | Metre : jagatii | Tone : niShaadaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : ubhayataH pavamaanasya rashmayo dhruvasya sataH pari yanti ketavaH . yadii pavitre adhi mRRijyate hariH sattaa ni yonaa kalasheShu siidati .
Component Words : ubhayataH . pavamaanasya . rashmayaH . dhruvasya . sataH . pari . yanti . ketavaH . yadi . pavitre . adhi . mRRijyate . hariH . sattaa . ni . yonaa . kalasheShu . siidati . 9.86.6
In Hindi:
ऋषि : अकृष्टा माषाः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः
विषय :
पदपाठ : उ॒भ॒यतः॑ । पव॑मानस्य । र॒श्मयः॑ । ध्रु॒वस्य॑ । स॒तः । परि॑ । य॒न्ति॒ । के॒तवः॑ । यदि॑ । प॒वित्रे॑ । अधि॑ । मृ॒ज्यते॑ । हरिः॑ । सत्ता॑ । नि । योना॑ । क॒लशे॑षु । सी॒द॒ति॒ ॥ ९.८६.६
पदार्थ : (ध्रुवस्य) इस ध्रुव परमात्मा को (सतः) जो सर्वत्र विद्यमान है और (पवमानस्य) जो कि सबको पवित्र करनेवाला है, उसको (रश्मयः) ज्योतियें (उभयतः) दोनों लोकों में (परियन्ति) प्राप्त होती हैं। वे ज्योतियें (केतवः) सर्वोपरि होने से केतु के समान हैं। (यदि) जब (पवित्रे) पवित्र अन्तःकरण में (हरिः) परमात्मा (अधिमृज्यते) साक्षात्कार किया जाता है, तब (सत्ता) उसकी सत्ता (नि) निरन्तर (कलशेषु, योना) अन्तःकरण-स्थानों में (सीदति) विराजमान होती है ॥६॥
भावार्थ : जो पुरुष अपने अन्तःकरणों को सत्कर्म्म द्वारा शुद्ध बनाते हैं, उन्हीं के अन्तःकरणों में परमात्मा प्रतिबिम्बित होता है, अन्यों के नहीं ॥६॥
In Sanskrit:
ऋषि : अकृष्टा माषाः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः
पदपाठ : उ॒भ॒यतः॑ । पव॑मानस्य । र॒श्मयः॑ । ध्रु॒वस्य॑ । स॒तः । परि॑ । य॒न्ति॒ । के॒तवः॑ । यदि॑ । प॒वित्रे॑ । अधि॑ । मृ॒ज्यते॑ । हरिः॑ । सत्ता॑ । नि । योना॑ । क॒लशे॑षु । सी॒द॒ति॒ ॥ ९.८६.६
भावार्थ :