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Rigveda / 9 / 86 / 21

अ॒यं पु॑ना॒न उ॒षसो॒ वि रो॑चयद॒यं सिन्धु॑भ्यो अभवदु लोक॒कृत् । अ॒यं त्रिः स॒प्त दु॑दुहा॒न आ॒शिरं॒ सोमो॑ हृ॒दे प॑वते॒ चारु॑ मत्स॒रः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 86 | Mantra No : 21

In Hindi:

ऋषि : पृश्नयोऽजाः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : अ॒यम् । पु॒ना॒नः । उ॒षसः॑ । वि । रो॒च॒य॒त् । अ॒यम् । सिन्धु॑ऽभ्यः । अ॒भ॒व॒त् । ऊँ॒ इति॑ । लो॒क॒ऽकृत् । अ॒यम् । त्रिः । स॒प्त । दु॒दु॒हा॒नः । आ॒ऽशिर॑म् । सोमः॑ । हृ॒दे । प॒व॒ते॒ । चारु॑ । म॒त्स॒रः ॥ ९.८६.२१

पदार्थ : (अयं) पूर्वोक्त परमात्मा अपनी शक्तियों से (पुनानः) पवित्र करता हुआ और (उषसः) उषाकाल का (विरोचयत्) प्रकाश करता हुआ (सिन्धुभ्यः) स्यन्दनशीला प्रकृति के सूक्ष्म तत्त्वों से (लोककृत्) संसार का करनेवाला (अभवत्) हुआ (उ) यह दृढ़ताबोधक है। (अयं त्रिः, सप्त) यह परमात्मा प्रकृति के एकविंशति महत्तत्त्वादि तत्त्वों को (दुहुहानः) दोहन करता हुआ (आशिरं) ऐश्वर्य को उत्पन्न करके (सोमः) यह जगदुत्पादक परमात्मा (चारु मत्सरः) जो अत्यन्त आह्लादक है, वह (हृदे) हमारे हृदय में (पवते) पवित्रता प्रदान करता है ॥२१॥

भावार्थ : परमात्मा ने प्रकृति से महत्तत्त्व उत्पन्न किया और महत्तत्त्व से जो अहंकारादि एकविंशति गण है, उसी का यहाँ “त्रिः सप्त” शब्द से गणन है, किसी अन्य का नहीं ॥२१॥