Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 9 / 86 / 23

अद्रि॑भिः सु॒तः प॑वसे प॒वित्र॒ आँ इन्द॒विन्द्र॑स्य ज॒ठरे॑ष्वावि॒शन् । त्वं नृ॒चक्षा॑ अभवो विचक्षण॒ सोम॑ गो॒त्रमङ्गि॑रोभ्योऽवृणो॒रप॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 86 | Mantra No : 23

In Hindi:

ऋषि : पृश्नयोऽजाः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : विराड्जगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : अद्रि॑ऽभिः । सु॒तः । प॒व॒से॒ । प॒वित्रे॑ । आ । इन्दो॒ इति॑ । इन्द्र॑स्य । ज॒ठरे॑षु । आ॒ऽवि॒शन् । त्वम् । नृ॒ऽचक्षाः॑ । अ॒भ॒वः॒ । वि॒ऽच॒क्ष॒ण॒ । सोम॑ । गो॒त्रम् । अङ्गि॑रःऽभ्यः । अ॒वृ॒णोः॒ । अप॑ ॥ ९.८६.२३

पदार्थ : (इन्दो) हे प्रकाशस्वरूप परमात्मन् ! आप (इन्द्रस्य) कर्मयोगी के कर्मप्रदीप्त (जठरेषु) अग्नि में (आविशन्) प्रवेश करते हुए (अद्रिभिः सुतः) वज्र से संस्कार किये हुए कर्मयोगी को (पवसे) पवित्र करते हैं (आ) और (पवित्रे) उसके पवित्र अन्तःकरण में (अभवः) निवास करें। (नृचक्षाः) तुम सर्वद्रष्टा हो (विचक्षणः) तथा सर्वज्ञ हो। (सोम) हे जगदुत्पादक ! आप (अङ्गिरोभ्यः) प्राणायामादि द्वारा (गोत्रं) कर्मयोगी के शरीर की रक्षा करें और उसके विघ्नों को (अपावृणोः) दूर करें ॥२३॥

भावार्थ : “गौर्वाग्गृहीता अनेनेति गोत्रं शरीरम्” जो वाणी को ग्रहण करे, उसका नाम यहाँ गोत्र है। इस प्रकार यहाँ शरीर और प्राणों का वर्णन इस मन्त्र में किया गया है और सायणाचार्य ने गोत्र के अर्थ यहाँ मेघ के किये हैं और “अङ्गिरोभ्यः” के अर्थ कुछ नहीं किये है। यदि सायणाचार्य के अर्थों को उपयुक्त भी माना जाय, तो अर्थ ये बनते हैं कि हे सोमलते ! तुम अङ्गिरादि ऋषियों से मेघों को दूर करो। इस प्रकार सर्वथा असंबद्ध प्रलाप हो जाता है। वास्तव में यह प्रकरण कर्मयोगी का है और उसी को प्राणों की पुष्टि के द्वारा विघ्नों को दूर करना लिखा है ॥२३॥