Rigveda / 9 / 86 / 31
प्र रे॒भ ए॒त्यति॒ वार॑म॒व्ययं॒ वृषा॒ वने॒ष्वव॑ चक्रद॒द्धरि॑: । सं धी॒तयो॑ वावशा॒ना अ॑नूषत॒ शिशुं॑ रिहन्ति म॒तय॒: पनि॑प्नतम् ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 86 | Mantra No : 31
In English:
Seer : trayaRRiShigaNaaH | Devta : pavamaanaH somaH | Metre : viraaDjagatii | Tone : niShaadaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : pra rebha etyati vaaramavyaya.m vRRiShaa vaneShvava chakradaddhariH . sa.m dhiitayo vaavashaanaa anuuShata shishu.m rihanti matayaH panipnatam .
Component Words : pra . rebhaH . eti . ati . vaaram . avyayam . vRRiShaa . vaneShu . ava . chakradat . hariH . sam . dhiitayaH . vaavashaanaaH . anuuShata . shishum . rihanti . matayaH . panipnatam . 9.86.31
In Hindi:
ऋषि : त्रयऋषिगणाः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : विराड्जगती | स्वर : निषादः
विषय :
पदपाठ : प्र । रे॒भः । ए॒ति॒ । अति॑ । वार॑म् । अ॒व्यय॑म् । वृषा॑ । वने॑षु । अव॑ । च॒क्र॒द॒त् । हरिः॑ । सम् । धी॒तयः॑ । वा॒व॒शा॒नाः । अ॒नू॒ष॒त॒ । शिशु॑म् । रि॒ह॒न्ति॒ । म॒तयः॑ । पनि॑प्नतम् ॥ ९.८६.३१
पदार्थ : (रेभः) शब्दब्रह्म का आधार परमात्मा (वारमव्ययं) वरणीय उपासक को (प्र अत्येति) भली-भाँति प्राप्त होता है। जो परमात्मा (वृषा) बलों का दाता है (स हरिः) वह सबको स्वसत्ता में लीन करनेवाला परमात्मा (वनेषु) उपासनाओं में (अवचक्रदत्) शब्दायमान होता है। (धीतयः) उपासक लोग (वावशानाः) उसकी उपासना में मग्न हुए-हुए (समनूषत) भली-भाँति उसकी स्तुति करते हैं। (पनिप्नतम्) उस शब्दब्रह्म के आदि कारण ब्रह्म को जो (शिशुं) सबका लक्ष्यस्थान है, उसको (मतयः) सुमति लोग (रिहन्ति) साक्षात्कार करते हैं ॥३१॥
भावार्थ : जो लोग चित्तवृत्ति को अन्य प्रवाहों से हटाकर एकमात्र परमात्मा का ध्यान करते हैं, वे ही परमात्मा को भली-भाँति साक्षात्कार करते हैं, अन्य नहीं ॥३१॥
In Sanskrit:
ऋषि : त्रयऋषिगणाः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : विराड्जगती | स्वर : निषादः
पदपाठ : प्र । रे॒भः । ए॒ति॒ । अति॑ । वार॑म् । अ॒व्यय॑म् । वृषा॑ । वने॑षु । अव॑ । च॒क्र॒द॒त् । हरिः॑ । सम् । धी॒तयः॑ । वा॒व॒शा॒नाः । अ॒नू॒ष॒त॒ । शिशु॑म् । रि॒ह॒न्ति॒ । म॒तयः॑ । पनि॑प्नतम् ॥ ९.८६.३१
भावार्थ :