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Rigveda / 9 / 86 / 43

अ॒ञ्जते॒ व्य॑ञ्जते॒ सम॑ञ्जते॒ क्रतुं॑ रिहन्ति॒ मधु॑ना॒भ्य॑ञ्जते । सिन्धो॑रुच्छ्वा॒से प॒तय॑न्तमु॒क्षणं॑ हिरण्यपा॒वाः प॒शुमा॑सु गृभ्णते ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 86 | Mantra No : 43

In Hindi:

ऋषि : अत्रिः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : पादनिचृज्ज्गती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : अ॒ञ्जते॑ । वि । अ॒ञ्ज॒ते॒ । सम् । अ॒ञ्ज॒ते॒ । क्रतु॑म् । रि॒ह॒न्ति॒ । मधु॑ना । अ॒भि । अ॒ञ्ज॒ते॒ । सिन्धोः॑ । उत्ऽश्वा॒से । प॒तय॑न्तम् । उ॒क्षण॑म् । हि॒र॒ण्य॒ऽपा॒वाः । प॒शुम् । आ॒सु॒ । गृ॒भ्ण॒ते॒ ॥ ९.८६.४३

पदार्थ : (अञ्जते) उक्त परमात्मा अपने ज्ञान द्वारा गति का हेतु है और (व्यञ्जते) पूर्वकृत कर्मों के द्वारा जीवों के विविध प्रकार के जन्मों का हेतु है तथा (समञ्जते) स्वयं न्यायशील होकर गति का हेतु है, इसलिये सम्यग्गति करानेवाला कथन किया गया और (क्रतुं) यज्ञरूप परमात्मा को (रिहन्ति) उपासक लोग ग्रहण करते हैं। जो परमात्मा (मधुना) अपने आनन्द से (अभ्यञ्जते) सर्वत्र प्रगट है और (सिन्धोरुच्छ्वासे) जो सिन्धु की उच्च लहरों में (पतयन्तं) गिरा हुआ मनुष्य है (उक्षणं) और बलस्वरूप है (हिरण्यपावाः) और सदसद्विवेकी है और (पशुं) जो ज्ञानदृष्टि से देखता है “पशुः पश्यतेः” इति निरुक्तम् ३।१६  उक्त पुरुष को परमात्मा (आसु) अपने आर्द्रभाव से अर्थात् कृपादृष्टि से (गृभ्णते) ग्रहण करता है ॥४३॥

भावार्थ : परमात्मा पतितोद्धारक है। जो पुरुष अपने मन्द कर्मों से गिरकर भी उद्योगी बना रहता है, परमात्मा उसका अवश्यमेव उद्धार करता है ॥४३॥