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Rigveda / 9 / 87 / 5

ए॒ते सोमा॑ अ॒भि ग॒व्या स॒हस्रा॑ म॒हे वाजा॑या॒मृता॑य॒ श्रवां॑सि । प॒वित्रे॑भि॒: पव॑माना असृग्रञ्छ्रव॒स्यवो॒ न पृ॑त॒नाजो॒ अत्या॑: ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 87 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : उशनाः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : ए॒ते । सोमाः॑ । अ॒भि । ग॒व्या । स॒हस्रा॑ । म॒हे । वाजा॑य । अ॒मृता॑य । श्रवां॑सि । प॒वित्रे॑भिः । पव॑मानाः । अ॒सृ॒ग्र॒न् । श्र॒व॒स्यवः॑ । न । पृ॒त॒नाजः॑ । अत्याः॑ ॥ ९.८७.५

पदार्थ : (एते) पूर्वोक्त (सोमाः) परमात्मा के सौम्यस्वभाव (गव्या) गतिशील (सहस्रा) सहस्र शक्तियोंवाले (महे) बड़े (वाजाय, अमृताय) यज्ञ के लिये जो (श्रवांसि) ऐश्वर्यरूप हैं (पवित्रेभिः) पवित्र अन्तःकरणों से जो (पवमानाः) पवित्रतावाले हैं, वे उक्तस्वभावों को (श्रवस्यवः) यश की इच्छा करनेवाले उपासक लोग (पृतनाजः) जो युद्धों में जेता बनने की इच्छा करते हैं, वे (अत्याः न) शीघ्रगामिनी विद्युत् की शक्तियों के समान (अभ्यसृग्रन्) धारण करें ॥५॥

भावार्थ : जो लोग संसार में विजेता बनना चाहें, वे परमात्मा के विचित्र भावों को धारण करें। जिस प्रकार सत्पुरुष के भावों को धारण करने से पुरुष सत्पुरुष बन सकता है, इसी प्रकार उस आदिपुरुष परमात्मा के गुणों के धारण करने से उपासक सत्पुरुष महापुरुष बन सकता है, इसका नाम परमात्मयोग है ॥५॥