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Rigveda / 9 / 87 / 7

ए॒ष सु॑वा॒नः परि॒ सोम॑: प॒वित्रे॒ सर्गो॒ न सृ॒ष्टो अ॑दधाव॒दर्वा॑ । ति॒ग्मे शिशा॑नो महि॒षो न शृङ्गे॒ गा ग॒व्यन्न॒भि शूरो॒ न सत्वा॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 87 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : उशनाः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : ए॒षः । सि॒वा॒नः । परि॑ । सोमः॑ । प॒वित्रे॑ । सर्गः॑ । न । सृ॒ष्टः । अ॒द॒धा॒व॒त् । अर्वा॑ । ति॒ग्मे । शिशा॑नः । म॒हि॒षः । न । शृङ्गे॑ । गाः । ग॒व्यन् । अ॒भि । शूरः॑ । न । सत्वा॑ ॥ ९.८७.७

पदार्थ : (एषः) उक्त परमात्मा (सुवानः) सर्वत्र आविर्भूत (सोमः) जो सौम्यस्वभावयुक्त है, वह (पवित्रे) पवित्र अन्तःकरण में (सृष्टः) रचे हुए (सर्गः) सृष्टियों के (न) समान (अर्वा) गतिशील जो परमात्मा है, वह (पर्यदधावत्) उपासकों की ओर अपनी ज्ञानदृष्टि से आता है। (न) जिस प्रकार (तिग्मे) तीक्ष्ण (शृङ्गे) अज्ञान के विदारण में (शिशानः) मग्न हुआ (महिषः) महापुरुष होता है अथवा (शूरः) शूरवीर (न) जैसे (सत्वा) स्थितिवाला होकर (गव्यन् गाः) बड़े ऐश्वर्य्य की इच्छा करता हुआ अपने लक्ष्य की ओर (अभि) जाता है, इसी प्रकार परमात्मा उपासकों को ज्ञानदृष्टि से लक्ष्य बनाता है ॥७॥

भावार्थ : जो लोग श्रवण-मननादि साधनों के द्वारा अपने अन्तःकरण को ज्ञान का पात्र बनाते हैं, परमात्मा उनके अन्तःकरण को अवश्यमेव ज्ञान से भरपूर करता है ॥७॥