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Rigveda / 9 / 89 / 3

सिं॒हं न॑सन्त॒ मध्वो॑ अ॒यासं॒ हरि॑मरु॒षं दि॒वो अ॒स्य पति॑म् । शूरो॑ यु॒त्सु प्र॑थ॒मः पृ॑च्छते॒ गा अस्य॒ चक्ष॑सा॒ परि॑ पात्यु॒क्षा ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 89 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : उशनाः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : सिं॒हम् । न॒स॒न्त॒ । मध्वः॑ । अ॒यास॑म् । हरि॑म् । अ॒रु॒षम् । दि॒वः । अ॒स्य । पति॑म् । शूरः॑ । यु॒त्ऽसु । प्र॒थ॒मः । पृ॒च्छ॒ते॒ । गाः । अस्य॑ । चक्ष॑सा । परि॑ । पा॒ति॒ । उ॒क्षा ॥ ९.८९.३

पदार्थ : (सिंहं) जो सिंह के समान है, (मध्वः) आनन्दस्वरूप है, (अयासं) जो अनायास से ही सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय करनेवाला है (अरुषं) दीप्तिवाला (दिवः) जो द्युलोक का (पति) है, (अस्य) उस परमात्मा के ज्ञान को (युत्सु शूरः) जो ज्ञानयज्ञादिरूप युद्ध में शूरवीर (प्रथमः) जो सबसे अग्रगण्य है, वह पाता है (अस्य पृच्छते) और जो इसके ज्ञान को पूँछता है, उस जिज्ञासु के लिये (अस्य चक्षसा) इसका कथन करनेवाला (गाः) उस ज्ञान का उपदेश करता है और (उक्षा) सब कामनाओं को परिपूर्ण करनेवाला परमात्मा (परिपाति) उसकी रक्षा करता है ॥३॥

भावार्थ : जो पुरुष परमात्मपरायण होते हैं, परमात्मा उनकी अपने ज्ञान के द्वारा रक्षा करता है ॥३॥