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Rigveda / 1 / 171 / 2

ए॒ष व॒: स्तोमो॑ मरुतो॒ नम॑स्वान्हृ॒दा त॒ष्टो मन॑सा धायि देवाः। उपे॒मा या॑त॒ मन॑सा जुषा॒णा यू॒यं हि ष्ठा नम॑स॒ इद्वृ॒धास॑: ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 171 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : अगस्त्यो मैत्रावरुणिः | देवता : मरुतः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : ए॒षः। वः॒। स्तोमः॑। म॒रु॒तः॒। नम॑स्वान्। हृ॒दा। त॒ष्टः। मन॑सा। धा॒यि॒। दे॒वाः॒। उप॑। ई॒म्। आ। या॒त॒। मन॑सा। जु॒षा॒णाः। यू॒यम्। हि। स्थ। नम॑सः। इत्। वृ॒धासः॑ ॥ १.१७१.२

पदार्थ : हे (देवाः) कामना करते हुए (मरुतः) विद्वानो ! जिससे (एषः) यह (वः) तुम्हारा (नमस्वान्) सत्कारात्मक (हृदा) हृदयस्थ विचार से (तष्टः) विधान किया (स्तोमः) सत्कारात्मक स्तुति विषय (मनसा) मन से (धायि) धारण किया जाय (हि) उसी को (मनसा) मन से (जुषाणाः) सेवते हुए (यूयम्) तुम लोग (उप, आ, यात) समीप आओ और (नमसः) अन्नादि ऐश्वर्य की (इत्) ही (ईम्) सब ओर से (वृधासः) वृद्धि को प्राप्त वा उसको बढ़ानेवाले (स्थ) होओ ॥ २ ॥

भावार्थ : जो धार्मिक विद्वानों के शील को स्वीकार करते हैं, वे प्रशंसित होते हैं ॥ २ ॥