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Rigveda / 9 / 96 / 12

यथाप॑वथा॒ मन॑वे वयो॒धा अ॑मित्र॒हा व॑रिवो॒विद्ध॒विष्मा॑न् । ए॒वा प॑वस्व॒ द्रवि॑णं॒ दधा॑न॒ इन्द्रे॒ सं ति॑ष्ठ ज॒नयायु॑धानि ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 96 | Mantra No : 12

In Hindi:

ऋषि : प्रतर्दनो दैवोदासिः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : यथा॑ । अप॑वथाः । मन॑वे । व॒यः॒ऽधाः । अ॒मि॒त्र॒ऽहा । व॒रि॒वः॒ऽवित् । ह॒विष्मा॑न् । ए॒व । प॒व॒स्व॒ । द्रवि॑णम् । दधा॑नः । इन्द्रे॑ । सम् । ति॒ष्ठ॒ । ज॒नय॑ । आयु॑धानि ॥ ९.९६.१२

पदार्थ : हे परमात्मन् ! (यथा) जिस प्रकार (मनवे) विज्ञानी पुरुष के लिये (अपवथाः) धनादिक देने के लिये आप पवित्र करते हैं, अन्नादिकों के देनेवाला (अमित्रहा) दुष्टों का दण्ड देनेवाला (वारिवोवित्) और धनादि ऐश्वर्य्य को देनेवाला (हविष्मान्) हविवाला भक्त पुरुष आपको प्रिय होता है, इस प्रकार हे परमात्मन् ! (एव) निश्चय करके (पवस्व) आप हमको पवित्र करें और (इन्द्रे) कर्म्मयोगी में (द्रविणं, दधानः) ऐश्वर्य्य को धारण करते हुए आप (सन्तिष्ठ) आकर विराजमान हों तथा (जनय, आयुधानि) कर्म्मयोगी के लिये अनन्त प्रकार के आयुधों को उत्पन्न करें ॥१२॥

भावार्थ : परमात्मपरायण पुरुष परमात्मा में चित्तवृत्तिनिरोध द्वारा अनन्त प्रकार के ऐश्वर्य्य और आयुधों को उत्पन्न करके देश को अभ्युदयशाली बनाते हैं ॥१२॥