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Rigveda / 9 / 96 / 23

अ॒प॒घ्नन्ने॑षि पवमान॒ शत्रू॑न्प्रि॒यां न जा॒रो अ॒भिगी॑त॒ इन्दु॑: । सीद॒न्वने॑षु शकु॒नो न पत्वा॒ सोम॑: पुना॒नः क॒लशे॑षु॒ सत्ता॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 96 | Mantra No : 23

In Hindi:

ऋषि : प्रतर्दनो दैवोदासिः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : अ॒प॒ऽघ्नन् । ए॒षि॒ । प॒व॒मा॒न॒ । शत्रू॑न् । प्रि॒याम् । न । जा॒रः । अ॒भिऽगी॑तः । इन्दुः॑ । सीद॑न् । वने॑षु । श॒कु॒नः । न । पत्वा॑ । सोमः॑ । पु॒ना॒नः । क॒लशे॑षु । सत्ता॑ ॥ ९.९६.२३

पदार्थ : (पवमान) हे सबको पवित्र करनेवाले परमात्मन् ! (शत्रून्, अपघ्नन्) अन्यायकारी शत्रुओं को नाश करते हुए (एषि) आप सत्पुरुषों को प्राप्त होते हैं। (जारः, न) जारयतीति जारोऽग्निः, जैसे अग्नि (प्रियाम्) कमनीय कन्या को प्राप्त होकर उसे संस्कृत करता है, जिस प्रकार (अभिगीतः, इन्दुः) सत्कार द्वारा आह्वान किया हुआ ज्ञानयोगी (वनेषु, सीदन्) भक्तों में स्थिर होता हुआ उनको शान्ति प्रदान करता है और (शकुनः) विद्युत्शक्ति (न) जैसे (पत्वा) अपने प्रभाव को ढालकर उन्हें उत्तेजित करती है, इसी प्रकार (सोमः) सर्वोत्पादक परमात्मा (पुनानः) सबको पवित्र करता हुआ (कलशेषु) भक्त पुरुषों के अन्तःकरण में (सत्ता) स्थिर होता है ॥२३॥

भावार्थ : अन्य पदार्थ जीवात्मा का ऐसा संस्कार नहीं कर सकते, जैसा कि परमात्मा करता है अर्थात् परमात्मज्ञान के संस्कार द्वारा जीवात्मा सर्वथा शुद्ध हो जाता है ॥२३॥