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Rigveda / 9 / 97 / 2

भ॒द्रा वस्त्रा॑ सम॒न्या॒३॒॑ वसा॑नो म॒हान्क॒विर्नि॒वच॑नानि॒ शंस॑न् । आ व॑च्यस्व च॒म्वो॑: पू॒यमा॑नो विचक्ष॒णो जागृ॑विर्दे॒ववी॑तौ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 97 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : भ॒द्रा । वस्त्रा॑ । स॒म॒न्या॑ । वसा॑नः । म॒हान् । क॒विः । नि॒ऽवच॑नानि । शं॒स॒न् । आ । व॒च्य॒स्व॒ । च॒म्वोः॑ । पू॒यमा॑नः । वि॒ऽच॒क्ष॒णः । जागृ॑विः । दे॒वऽवी॑तौ ॥ ९.९७.२

पदार्थ : उक्त विद्वान् (विचक्षणः) विलक्षण बुद्धिवाला (जागृविः) जागरणशील (चम्वोः, पूयमानः) बड़े-बड़े समाजों को अपने ज्ञान द्वारा पवित्र करता हुआ (समन्या) शान्ति की (वस्त्रा) रक्षा करनेवाले (भद्राः) सुन्दर भावों को (वसानः) धारण करता हुआ (निवचनानि) शंसन् जो सुन्दर वक्तव्य है, उनको जानता हुआ (महान्, कविः) महा विद्वान् होता है। (देववीतौ) यज्ञ के विषय में उक्त विद्वान् को (आवच्यस्व) ऐसा वचन कहकर सत्कृत करें ॥२॥

भावार्थ : जो पुरुष अपने आध्यात्मिकादि यज्ञों में उक्त विद्वानों की प्रशंसा तथा सत्कार करते हैं, वे अभ्युदयशील होते हैं ॥२॥