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Rigveda / 9 / 97 / 12

अ॒भि प्रि॒याणि॑ पवते पुना॒नो दे॒वो दे॒वान्त्स्वेन॒ रसे॑न पृ॒ञ्चन् । इन्दु॒र्धर्मा॑ण्यृतु॒था वसा॑नो॒ दश॒ क्षिपो॑ अव्यत॒ सानो॒ अव्ये॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 97 | Mantra No : 12

In Hindi:

ऋषि : मन्युर्वासिष्ठः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : अ॒भि । प्रि॒याणि॑ । प॒व॒ते॒ । पु॒ना॒नः । दे॒वः । दे॒वान् । स्वेन॑ । रसे॑न । पृ॒ञ्चन् । इन्दुः॑ । धर्मा॑णि । ऋ॒तु॒ऽथा । वसा॑नः । दश॑ । क्षिपः॑ । अ॒व्य॒त॒ । सानौ॑ । अव्ये॑ ॥ ९.९७.१२

पदार्थ : (देवः) उक्त परमात्मरूप देव (देवान्) विद्वानों को (स्वेन) अपने (रसेन) आनन्द से (पृञ्चन्) तृप्त करता हुआ (अभि प्रियाणि) सब प्रिय पदार्थों को (पवते) पवित्र करता है। (पुनानः) सबको पवित्र करनेवाला परमात्मा (इन्दुः) जो प्रकाशस्वरूप है, वह (धर्माणि) वर्णाश्रमों के धर्म्मों को पृथक्-२ विधान करता हुआ (ऋतुथा) सब ऋतु और देश-कालों में (वसानः) निवास करता हुआ (दश, क्षिपः) पाँच स्थूल और पाँच सूक्ष्म भूतों के (अव्ये, सानौ) ब्रह्माण्डरूप इस कार्य्य में विराजमान होकर (अव्यत) हमारी रक्षा करता है ॥१२॥

भावार्थ : परमात्मा सूत्रात्मारूप से सब सूक्ष्म और स्थूल भूतों में विराजमान है और उसी ने आदि सृष्टि में वर्णाश्रमों का गुण, कर्म, स्वभाव द्वारा विभाग किया है ॥१२॥